कारपोरेट कल्चर वाला पार्टी दफ्तर

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद लुटियंस जोन में जितनी पार्टियों के दफ्तर थे उन्हें लुटियंस जोन के बाहर अपना निजी कार्यालय बनाना है। इस काम में बीजेपी ने बाजी मारी और दो साल के रिकार्ड समय में दीनदयाल रोड पर अपना कार्यालय बना भी लिया और ११ अशोक रोड से ६ए दीनदयाल रोड पर कार्यालय को शिफ्ट भी कर लिया।

भाजपा का यह नया कार्यालय कनाट प्लेस और नई दिल्ली स्टेशन के पास है। दिल्ली के आईटीओ से नई दिल्ली स्टेशन के लिए जो रोड जाता है उसके आखिरी छोर पर दीनदयाल पार्क के सामने लाल पत्थरों की जो एक बंद इमारत है, वही भाजपा का नया कार्यालय है। गूगल के पुराने पर मैप पर यह जगह पार्क के तौर पर अंकित थी। लेकिन अब गूगल मैप पर पार्क का एक हिस्सा गायब है। जो गायब हिस्सा है उस पर बीजेपी का कारपोरेट कार्यालय दिखता है।

भवन का निर्माण कुछ इस तरह से किया गया है कि अच्छा भला आदमी चकरा जाए कि कहां से प्रवेश करना है और कहां से बाहर निकलना है। आम आदमी का प्रवेश तो खैर बहुत दूर की बात दिखती है। इस भवन का डिजाइन कुछ इस तरह से किया गया है कि यह एक सुरक्षित किले जैसा दिखाई दे। और यह है भी। गेट पर मौजूद सुरक्षाकर्मी आपकी जांच पड़ताल करते हैं। हालांकि वो ये नहीं पूछते कि आपको किससे मिलना है, या फिर कहां जाना हैं? लेकिन किसी भी सार्वजनिक जगह पर अगर आपकी जांच पड़ताल होते ही आप सहम जाते हैं। वही सहमा हुआ अनुभव यहां होता है।

किसी राजनीतिक दल के दफ्तर में जाने के लिए आपके मन में जो निश्चिंतता होनी चाहिए उसे गेट पर ही उतार लिया जाता है। फिर आप सहमें हुए से भीतर दाखिल होते हैं। परिसर के अंदर पहुंचते ही आप ये नहीं समझ पाते कि भवन के भीतर कहां से जाएं। दोनों ओर से दो सीढियां प्रथम तल की तरफ जाती हैं जिसमें से एक छोर पर स्वागत कक्ष बनाया गया है। यहां भी आपसे कोई नहीं पूछता कि आप क्यों आये हैं लेकिन पूरा माहौल किसी कॉरपोरेट कार्यालय जैसा ही है। स्वागत कक्ष से लेकर पार्टी अध्यक्ष के चौथी मंजिल स्थित दफ्तर तक। आपको कहीं से यह असहास नहीं होता कि आप किसी राजनीतिक दल के दफ्तर में आये हैं। आपकी अनुभूति किसी बड़ी कॉरपोरेट कंपनी के कार्यालय में मौजूद होने का ही होता है।

लंबे चौड़े गलियारे और उन गलियारों के किनारे मंहगे एसी केबिन। ऐसी भी फ्लोर माउण्टेड है। कुर्सी मेज सब किसी भी कंपनी के कारपोरेट आफिस से ज्यादा कुलीन और शायद मंहगे भी। पार्टी जनरल सेक्रेटरी से अगर आप मिलने जाएंगे तो महसूस करेंगे कि आप किसी कंपनी के रिजनल मैनेजर के दफ्तर में जा रहे हैं। पार्टी अध्यक्ष के दफ्तर को फोर्थ फ्लोर कहा जाता है। वहां तक वही पहुंच सकता है जिसे पार्टी अध्यक्ष की इजाजत मिली हो।

पार्टी दफ्तर का डिजाइन आपके मन में यह बात बिना कहे भर देता है कि बिना किसी काम के यहां आना मना है। कोई आपसे पूछता नहीं कि आप किससे मिलने जा रहे हैं लेकिन मानों हर दीवार आपसे यही पूछती है कि अगर कोई काम नहीं है तो आप यहां क्यों आ गये? किसी पार्टी दफ्तर का वास्तु और डिजाइन इस तरह का हो कि आप बिना काम के वहां जाने से कतराएं तो यह तो उसके लिए शुभ संकेत नहीं है। राजनीतिक दलों के दफ्तर कॉरपोरेट या सरकारी आफिस नहीं होते जहां आप तभी जाएंगे जब आपको कोई काम हो। आप तब भी वहां जाते हैं जब आपको कोई काम न हो। यह बिना काम वाली भीड़ ही किसी पार्टी की ताकत होती है और लोकतंत्र का आधार भी।

लेकिन दुर्भाग्य से बिना काम वाली भीड़ को भाजपा कार्यालय के वास्तुकार ने बिना कुछ कहे ही बाहर कर दिया है। भाजपा का नया आफिस किसी पार्टी का दफ्तर लगने से ज्यादा किसी कारपोरेट कंपनी का हेडक्वार्टर या फिर ज्यादा से ज्यादा इजरायल का अति सुरक्षित दूतावास ज्यादा नजर आता है।

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