सोशल जस्टिस के प्रापर्टी डीलर

भारतीय राजनीति में वीपी सिंह का उदय वैसे तो अपनी ही पार्टी के नेता राजीव गांधी के खिलाफ भ्रष्टाचार की लड़ाई के नाम पर हुआ था लेकिन जल्द ही वो भारतीय राजनीति में सामाजिक न्याय के न्यायमूर्ति बन गये। उन्होंने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की जिससे सरकारी नौकरियों में जातिगत आरक्षण का रास्ता साफ हुआ।

सरकारी नौकरियों में जातिगत आरक्षण ने राजनीति में एक नयी संभावना पैदा की। जाति के नाम पर राजनीति। जनता पार्टी के दौर से निकले कुछ नेता जातियों के नायक बनकर उभरे। खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार में। उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित राजनीति के लिए जगह तलाशते कांशीराम और जनता दल से अलग हुए समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव ने इन संभावनाओं का भरपूर दोहन किया। उघर बिहार में जातिवादी राजनीति के मसीहा के रूप में लालू का जन्म हुआ तो इधर कांशीराम के निधन के बाद उनकी स्वघोषित उत्तराधिकारी मायावती ने इस जातिवादी राजनीति को नयी ऊंचाई दिया।

यूपी बिहार के इन जातिवादी नेताओं के उभार ने इनकी जातियों को कोई ऊंचाई दिया हो कि न दिया हो लेकिन इन नेताओं को पापर्टी डीलर जरूर बना दिया। बीते एक साल से लालू यादव एण्ड सन्स के खिलाफ केन्द्र की एजंसियों की जो जांच पड़ताल चल रही है उसमें पटना से लेकर दिल्ली तक सिर्फ बेनामी संपत्तियों का ही ब्यौरा जुटाया जा रहा है। कहीं बेनामी जमीन तो कहीं बेनामी फार्म हाउस। अरबों रूपये की जमीन जायदाद तैयार की गयी। कहीं बेटे की किसी बेनामी कंपनी के जरिए तो कहीं बेटी की बेनामी कंपनी के जरिए।

यही हाल मुलायम सिंह यादव का भी है। सैफई, लखनऊ से लेकर नोएडा दिल्ली तक मुलायम कुनबे का पापर्टी डीलिंग का कारोबार बिखरा पड़ा है। कहीं नामी तो कहीं बेनामी। उनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति की जांच में एक से एक फर्जीवाड़े सामने आये थे लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला।

नामी बेनामी संपत्तियों के मामले में मायावती इन सबमें सबसे आगे है। उन्होंने न सिर्फ दलित नेताओं के नाम पर स्मारक और संपत्तियां निर्मित की बल्कि अपने पैतृक गांव से लेकर दिल्ली के सरदार पटेल रोड और लखनऊ के मंहगे माल एवेन्यू रोड तक आलीशान महल बनवाये। आज मायावती के पास दिल्ली में ही कम से तीन सरकारी बंगले, एक निजी बंगला, लखनऊ में एक सरकारी और एक निजी बंगला, और बादलपुर में शाही किला है। ये सब संपत्तियां किस तरीके से अर्जित की गयी हैं इसकी न कभी जांच होती है और न मायावती पर कोई आंच आती है। उल्टे दलित वोट की सौदेबाजी करके वो अपने इन बंगलों को बढ़ाती चढ़ाती रहती है।

सवाल ये है कि ये नेता क्या करने आये थे राजनीति में? अगर इनका असली मकसद राजनीति में आकर पापर्टी डीलर बनना ही था तो फिर व्यापार का रास्ता क्यों नहीं चुना? जिन वर्गों, जातियों के नाम पर इन्होंने राजनीति की उसको सामाजिक न्याय कहां मिला? क्या उसकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति में बदलाव आया? उतना नहीं आया जितनी उम्मीद इनसे की जा सकती थी। लेकिन इन नेताओं की स्थिति में जबर्दस्त बदलाव आया और ये सामाजिक न्याय के सभी नेता बड़े प्रापर्टी डीलर बन गये। इसीलिए आज जब सुप्रीम कोर्ट कह रहा है कि पूर्व मुख्यमंत्री के नाम पर एलॉट किये गये बंगले को वो लोग खाली कर दें तो भांति भांति की जुगत लगाकर उसे बचाने की कोशिश कर रहे हैं।

इन नेताओं की सत्ता पाने या सत्ता में बने रहने की प्राथमिकता ये नहीं है कि उनके समर्थक वर्ग को इसका राजनीतिक लाभ मिले। बल्कि अब ये लोग अपने समर्थक वर्ग को ही इसलिए मूर्ख बनाते हैं ताकि इनके प्रॉपर्टी का कारोबार चलता रहे।

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