ये जनता है, इसे ट्रोल मत कहो-२

ट्रोल स्पेनिश का शब्द है जिसका मतलब होता है एक काल्पनिक शैतान जो बहुत भद्दा है। हो सकता है स्पेन में डराने के लिए ये शब्द कहीं से चलन में आया हो लेकिन इंटरनेट पर सबसे पहले इस नाम का इस्तेमाल उन रोबोट्स के लिए किया जो आटोमेटेड आपरेशन करते थे। जैसे, किसी की लाइक बढ़ा देना। किसी का फालोअर बढ़ा देना।

फिर धीरे धीरे उन लोगों को ट्रोल कहा जाने लगा जो किसी पार्टी या संस्था के इशारे या पेमेन्ट पर काम करते थे। ऐसे पेड वर्करों की बाढ़ २०१४ के आम चुनाव में आई थी जब मोदी ने सबसे ज्यादा इन पेड वर्करों का इस्तेमाल अपना प्रचार करने के लिए किया।

लेकिन उसके बाद एक नया चलन शुरु हो गया। अपने विरोधियों और आलोचकों को ट्रोल घोषित किया जाने लगा। ट्रोल घोषित करने का सबसे ज्यादा ये काम उन वामपंथी पक्षकारों ने किया जो सबसे ज्यादा अभिव्यक्ति की आजादी का रोना रोते हैं। अपने खिलाफ आनेवाली हर आवाज को इन पक्षकारों ने ट्रोल घोषित करना शुरु कर दिया।

लेकिन अब बात उसके भी आगे जा रही है। सामान्य पत्रकार भी अब सोशल मीडिया की आवाज को ट्रोल साबित करने में लग जाते हैं। यह सीधे सीधे जनता की आवाज को दबाने की एक और तानाशाही तरीका है। टिप्पणी करनेवाला हिन्दू हो कि मुसलमान। उसे ट्रोल कहना उसके अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला है। हो सकता है उसकी भाषा ठीक न हो, लेकिन इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं कि वह ट्रोल है। उसका जो गुस्सा है, अपने गुस्से को अपनी भाषा में अभिव्यक्त कर रहा है। उसे ट्रोल कहने की बजाय मीडिया उन्हें जनता क्यों नहीं कहती?

अभी ताजा मामला सुषमा स्वराज का है जिसमें उन्होंने एक धर्म परिवर्तन करनेवाली औरत को गैर कानूनी तरीके से वीजा जारी करवा दिया। उनके इस कदम का सोशल मीडिया पर जबर्दस्त विरोध हुआ जिसके बाद सुषमा स्वराज ने रिट्वीट करके बताया कि उन्हें गाली दी जा रही है। इसके तुरंत बाद कुछ मीडिया पोर्टलों ने सुषमा स्वराज को वीरांगना बताकर उनका गुणगान शुरु कर दिया गया कि देखिए कैसे वो इंटरनेट के ट्रोल को बेपर्दा कर रही हैं। इन बेशर्म मीडिया घरानों को सवाल जनता पर उठाने की बजाय सवाल तो सुषमा स्वराज पर उठाना चाहिए था कि आखिर उन्होंने कोई कार्रवाई क्यों नहीं की? लेकिन कॉरपोरेट मीडिया ने इस जन अभिव्यक्ति को दबाने की साजिश रचनी शुरु कर दी।

यह वह खतरनाक खेल है जो कॉरपोरेट मीडिया ने सत्ताधीशों के साथ मिलकर खेलना शुरु कर दिया है। यह खेल जितना अधिक बढ़ेगा उतना जन अभिव्यक्ति को ट्रोल घोषित करके उसे दबाने या हवा में उड़ा देने की कोशिश की जाएगी। इस साजिश के पीछे सीधा सा मकसद है कि जनता की अभिव्यक्ति को ट्रोल बताकर खारिज कर दिया जाए ताकि मीडिया घरानों की चौधराहट चलती रहे। इसीलिए वो जनता की विश्वसनीयता पर ही हमला कर रहे हैं।

लेकिन कॉरपोरेट मीडिया के जो पक्षकार या मीडिया घरानों के पेड गुलाम जन अभिव्यक्ति को ट्रोल घोषित करने का पाप कर रहे हैं, समय उन्हें कभी माफ नहीं करेगा। सोशल मीडिया ऐसे मीडिया घरानों को भी रौंदते हुए आगे निकल जाएगा।

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