बियाबान में शोर

क्या भारत में महिलाएं असुरक्षित हैं?

थॉम्सन रॉयटर का यह कहना कि महिलाओं के लिए भारत दुनिया का सबसे असुरक्षित देश बन चुका है, एक साजिश है। साजिश इस तरह कि उन्होंने कोई सर्वे नहीं किया है। कुछ महिला अधिकार पर काम करनेवाले विशेषज्ञों से बात किया है। जाहिर है, भारत में उनका सामना बड़ी बिन्दी गैंग से ही हुआ होगा। मोदी राज में वो भला क्योंकर भारत में महिलाओं को सुरक्षित बताएंगी? तिस पर मोदी ने एफसीआरए अलग से कड़क कर रखा है। इसलिए महिलाओं के लिए भारत को दुनिया का सबसे असुरक्षित देश घोषित कर देने से, आय के नये विदेशी स्रोत विकसित होंगे।

लेकिन मैं इस पर बात नहीं करना चाहता। ये तो एक गैंगवार है। आप जिनकी रोजी रोटी छीन रहे हैं, वो तो आप पर वार करेंगे ही। मेरे मन में दूसरा सवाल है। क्या भारत में सचमुच महिलाओं पर कोई खतरा नहीं है? क्या हम दावे से कह सकते हैं कि भारत में महिलाएं पूरी तरह से सुरक्षित हैं? और ये जो ‘सुरक्षित’ टर्म है वह हम किस तरह से इस्तेमाल कर रहे हैं? क्या ‘सुरक्षित’ का मतलब उनके साथ मारपीट, उनका अनादर या उनका शोषण है या फिर सुरक्षित से मतलब सिर्फ सेक्सुअल हमला है?

ऐसा लगता नहीं कि भारत में बीते कुछ सालों से जब हम महिलाओं के लिए “सुरक्षित” शब्द का इस्तेमाल करते हैं तो उसका मतलब मारपीट या अनादर आदि है। हमारे यहां महिलाओं के लिए जब “सुरक्षा” शब्द का इस्तेमाल होता है तो उसका मतलब सीधे सीधे सेक्सुअल अटैक या यौन हिंसा ही होता है। कामातुर पुरुष जहां तहां उनको घूर रहा है, छूने की कोशिश कर रहा है और मौका मिलते ही बलात्कार भी कर रहा है। अब तो बलात्कार के बाद हत्या भी एक नया अपराध जुड़ता जा रहा है।

कानूनी रूप से बीते पांच सात सालों में बहुत तेजी से बहुत सारे उपाय किये गये हैं। छूने, घूरने और पीछा करने जैसे फीचर जो गली गली में मजनू तैयार करते थे, वो अब संज्ञेय अपराध घोषित हो गये हैं। इसी तरह बलात्कार की सजा भारत में बहुत कड़ी कर दी गयी है। बलात्कार की न्यूनतम सजा १० साल और अधिकतम आजीवन कारावास है। अगर अबोध बच्चे के साथ ऐसी घटना होती है तो फांसी की सजा तक मुकर्रर किया जा चुका है। इसके बाद अब सरकार के हिस्से में करने के लिए बहुत कुछ बचा नहीं है। सरकार का काम है कानून बनाना और जितना कड़ा कानून हो सकता था, उसने बना दिया है। सवाल है उसके बाद भी क्या थॉमसन रॉयटर का परसेप्शन सही माना जाए कि भारत महिलाओं के बारे में सबसे असुरक्षित देश है?

अभी तक तो नहीं था लेकिन ये कठोर कानूनी प्रावधान शायद इसे बना देंगे। औरत मर्द का रिश्ता प्रकृति का स्वाभाविक रिश्ता है। इसे जितना सहज रखा जाएगा उतने ही यौन अपराध कम होंगे। वैसे ही जैसे आदिवासी या ग्रामीण भारत में है। यह मजेदार है कि भारत के सबसे पिछड़े इलाके कहे जानेवाले क्षेत्रों में महिलाओं पर यौन हिंसा का उतना खतरा नहीं है जितना आधुनिक नगरों में है। जैसे जैसे उत्तरोत्तर भारत के आधुनिक नगरों में प्रवेश करते जाएंगे महिलाओं पर यौन अत्याचार का खतरा बढ़ता चला जाता है। आखिर ऐसा क्यों है कि परंपरागत समाज की बजाय आधुनिक नगरों में महिलाएं ज्यादा असुरक्षित हैं?

इसका कारण संभवत: ये है कि आधुनिक भारत में स्त्री पुरुष के बीच रिश्ते को लगातार असहज किया जा रहा है। कुछ तो भारत की परंपरागत सोच और कुछ आधुनिकता का प्रकोप। इन दोनों ने मिलजुलकर शहरी इलाकों के साथ साथ थोड़ा थोड़ा ग्रामीण इलाकों को भी अपने प्रकोप के दायरे में ले लिया है। हमारी नगरीय सभ्यता में स्त्री पुरुष के बीच रिश्ते सहज नहीं रह गये हैं और लगातार असहज होते जा रहे हैं। उसका कारण ये है कि हम एक नयी नगरीय सभ्यता रचने की कोशिश कर रहे हैं और उसी के मुताबिक नयी जीवनशैली भी अपना रहे हैं। इन नयी नगरीय जीवनशैली में हर स्त्री को ये बात समझायी जा रही है कि हर अपरिचित पुरुष एक संभावित यौन अपराधी है इसलिए उसे किसी भी कीमत पर किसी भी पुरुष पर भरोसा नहीं करना है। जाहिर है इससे नव नगरीय जीवन शैली में स्त्री पुरुष के बीच मेलजोल की बजाय एक असहज दूरी बढ़ रही है और दुश्मनी भी पनप रही है।

बलात्कार के कम ही मामले ऐसे होते हैं जब सिर्फ शारीरिक जरूरत को पूरा करने के लिए अंजाम दिये जाते हैं। बलात्कार के लिए दूसरे कारक ज्यादा जिम्मेदार हैं। इनमें एक कारक है “सबक सिखाने” वाला भी है। ऐसे मामलों में स्त्री के साथ जघन्यतम अपराध भी किये जाते हैं। यह वह मनोवैज्ञानिक कारण है जिस पर कानून बनाने वाला समुदाय बिल्कुल ध्यान नहीं देता। वह दे भी नहीं सकता। कानून बनाने और लागू करनेवाली संस्थाओं का स्वरूप लॉ एण्ड आर्डर मेन्टेन करनेवाला है। वो यौन हिंसा को भी अपराध के नजरिए से ही देखते हैं, उसके सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारणों को समझने और विश्लेषण करने की क्षमता उनके पास नहीं है। वो अपराध के घटित होने का इंतजार करते हैं और अपराध घटित हो जाए तो अपनी नियमावली के तहत कार्रवाई करते हैं। इसलिए कानूनी रूप से ये हमेशा एक समस्या बना रहेगा। वो कानून को लगातार कठोर करते जाएंगे और समस्या भी लगातार विकराल होती जाएगी।

लेकिन यौन अपराध और यौन हिंसा की ये समस्या लॉ एण्ड आर्डर की समस्या बिल्कुल नहीं है। ये मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समस्या है। इसलिए भारते के ग्रामीण इलाकों के मुकाबले भारत के शहरी इलाके इसकी चपेट में ज्यादा हैं। कहीं कहीं तो स्वाभाविक संबंधों को भी संबंध बिगड़ने पर बलात्कार बताने की कोशिश की जाती है। ये सामाजिक जटिलताएं हैं जिन्हें समझा जाना जरूरी है। इस बात को हमेशा याद रखिए कि भारत एक इतना जटिल समाज है जो न्याय पाने के लिए कानून का सहारा कम लेता है, सबक सिखाने के लिए ज्यादा लेता है। और जैसे ही आप कानून का इस्तेमाल “सबक” सिखाने के लिए करने लगते हैं आप पीड़ित होने की बजाय पीड़ा देनेवाले बन जाते हैं।

इसलिए भारत में यौन अपराधों को लेकर सामाजिक स्तर पर और खासकर महिलाओं के बीच आत्मविश्वास पैदा करने की जरूरत है ताकि वो अपने भीतर का डर निकाल सकें। वो जितनी सहज और निडर रहेंगी यौन अपराध होने की संभावना उतनी कम हो जाएगी। अभी हमारे यहां इसके बिल्कुल उलट हो रहा है। हमारा पूरा प्रशासनिक तंत्र, मीडिया, एनजीओ सब औरतों और लड़कियों को डराने में लगे हैं। डर के इस माहौल में यौन अपराध की संभावनाएं कम होने की बजाय, और बढ़ेगी। अभी भी भारत में महिलाओं को असुरक्षा की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता लेकिन इसी तरह भयग्रस्त माहौल बढ़ता रहा रहा तो निश्चित रूप से वो असुरक्षा की श्रेणी में आ जाएंगी। शहरी इलाकों में जहां कानून का शासन प्रभावी है, वहां ये दिखता भी है। ग्रामीण इलाकों में जहां अभी भी भारत की सामाजिक व्यवस्था प्रभावी है, वहां महिलाएं आधुनिक होते शहरों की अपेक्षा ज्यादा सुरक्षित हैं।

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