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नंगरहार से नदारद होने के कगार पर

सिक्खों की एक खूबी से कोई इन्कार नहीं कर सकता। लंगर और सेवा। सिर्फ गुरुद्वारों में ही नहीं, कहीं कोई आपदा हो तो सिक्ख बिना किसी भेदभाव के सेवा करने के लिए प्रस्तुत हो जाता है। रोहिंग्या मुसलमानों का मामला हो या कि किसी और का। आलोचनाओं के बाद भी उन्होंने सेवा में कभी भेदभाव न किया।

लेकिन जैसे जैसे सच्चा इस्लाम जागा उसने पाकिस्तान मेंं सिक्खों को भी निशाना बनाना शुरु कर दिया। मजहबी शिक्षा के दौरान मुसलमानों को यह बात सिखाई जाती है कि दुनिया में मुसलमानों के अलावा और किसी का अस्तित्व स्वीकार नहीं करना है इसलिए कहीं न कहीं से कोई न कोई सच्चा मुसलमान पैदा हो ही जाता है और किसी न किसी समूह पर हमला कर बैठता है।

पाक-अफगान सीमा के दोनों तरफ कभी महाराजा रणजीत सिंह का राज था। लेकिन अब वहां गिनती के सिक्ख बचे हैं। जो बचे हैं उन पर दबाव बढ़ गया है कि वो इंसानियत का रास्ता छोड़कर इस्लामियत का रास्ता अख्तियार कर लें। इसीलिए कुछ दिन पहले पेशावर में एक सिक्ख पर हमला हुआ और अब जलालाबाद में सिक्खों पर आत्मघाती हमला हुआ। इस आत्मघाती हमले में १७ लोग मारे गये हैं जिसमें ज्यादातर सिख और हिन्दू हैं। इनका दोष सिर्फ इतना था कि वो गैर मुस्लिम थे और मुस्लिम देश की राजनीति में सक्रिय होने का साहस रखते थे।

सिक्खों और हिन्दुओं के कुल जमा तीन सौ परिवार हैं नंगरहार में। उन्होंने कह दिया है कि वो अफगानिस्तान छोड़कर जाएंगे। पाकिस्तानी हिन्दुओं और कश्मीरी पंडितों की तरह वो भी भारत के अंदरूनी हिस्सों में कहीं शरण लेंगे। इस तरह सहिष्णुता की तमाम बहसों के बीच एक और इलाका काफिरों से मुक्त करा लिया जाएगा। जो लोग ये समझते हैं कि इक्कीसवीं सदी में इस्लाम थोड़ा बहुत बदल गया है, यह उनके लिए एक संदेश है। सच्चा इस्लाम न कभी बदला है, न कभी बदलेगा। वह सिर्फ मौका मिलने का इंतजार करता है ताकि काफिरों पर मुकम्मल ईमान कायम किया जा सके।

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