इमरान खान नियाजी का अल्पसंख्यक विरोधी आगाज

इमरान खान का शपथ लेना सोशल मीडिया में इसलिए चर्चा में आया कि उन्होंने उर्दू और अरबी के शब्दों का गलत उच्चारण किया। लेकिन इमरान खान अपने शपथ ग्रहण में जिन शब्दों के उच्चारण के लिए हंसी के पात्र बने अगर उनका अर्थ समझ में आ जाए तो रोना आ जाए।

अगर कोई आपका दुश्मन है तो उससे दुश्मनी पाल लेना स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती है। इस्लाम और लोकतंत्र का ऐसा ही स्वाभाविक दुश्मनी वाला रास्ता है। लोकतंत्र इस्लाम का सबसे बड़ा दुश्मन है। लोकतंत्र से पहले इस्लाम को इतनी बड़ी चुनौती और किसी से नहीं मिली थी। उसका विस्तार, उसके शासन के तरीके सब पर लोकतंत्र ने पहरा बिठा दिया।

आज भी दुनिया के अलग अलग हिस्सों में इस्लामिक देशों में लोकतंत्र को लेकर बहस जारी रहती है लेकिन लोकतंत्र से इस्लाम का तालमेल बन नहीं पाया है। जाहिर है प्रतिक्रिया में मुसलमान भी लोकतंत्र से अपनी दुश्मनी को छिपा नहीं पाता। उसे वह इस्लाम के सांचे में ढालने की पूरी कोशिश करता है, सफल रहे या फिर असफल।

शनिवार को पाकिस्तान में इमरान खान के प्रधानमंत्री की शपथ उसी असफल कोशिश का एक लक्षण है। किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्यक्ति अपनी आस्था के आधार पर शपथ ले सकता है लेकिन वह आस्था अगर इस्लामिक हो तो खतरनाक हो जाती है। मसलन, सिर्फ इतना कसम खाने से अब काम नहीं चलता कि मैं इस्लामिक उसूलों के मुताबिक शासन प्रसाशन कायम करुंगा। इससे आगे भी जाना पड़ता है जहां एक मुसलमान ही दूसरे मुसलमान को इस्लाम से खारिज करता है।

यह आगे जाना है इस्लाम में शिया सुन्नी का बंटवारा। आज इमरान खान के शपथ ग्रहण में शिया सुन्नी के इस बंटवारे का असर साफ नजर आया। उन्होंने शपथ लेते हुए कसम खाई कि वो खत्मे नबूअत में पूरी आस्था रखते हैं और इस बात में पूरा विश्वास व्यक्त करते हैं कि इस्लाम में अब भविष्य में कोई नबी या पैगंबर पैदा नहीं होगा। आप भी सोचते होंगे कि एक प्रधानमंत्री को शपथ लेते समय इन बातों की कसम क्यों खानी पड़ी? वह इसलिए क्योंकि यहीं से शिया सुन्नी का बंटवारा शुरु होता है और अहमदिया संप्रदाय को इस्लाम से खारिज किया जाता है।

इस्लाम में शिया और अहमदिया संप्रदाय मोहम्मद को आखिरी पैगंबर नहीं मानते। इस मामले में दोनों संप्रदायों की अलग अलग मान्यता है। शिया मानते हैं कि अभी एक पैगंबर और आयेंगे जबकि अहमदिया अपने प्रवर्तक गुलाम मोहम्मद को भी पैगंबर मानते हैं। उनकी इन मान्यताओं का असर ये है कि सुन्नी मुसलमान उन्हें मुसलमान मानने से इंकार कर देता है और पाकिस्तान में तो वाजिबुल कत्ल के फतवे तक जारी किये जा चुके हैं। सुन्नी मुसलमान चाहें बरेलवी हों या देओबंदी दोनों शिया और अहमदिया को इस्लाम से खारिज करते हैं।

इसलिए इमरान खान ने शपथ ग्रहण समारोह में खत्मे नबूअत की कसम खाकर कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेक दिये हैं। चुनाव शुरु होने से पहले ही यह मुद्दा गरमाया था जब एक धार्मिक विधेयक में संशोधन कर दिया गया था। उस संशोधन में मोहम्मद को आखिरी पैगंबर नहीं कहा गया था। इसका सुन्नी मुसलमानों में जबर्दस्त प्रतिक्रिया हुई तहरीके लब्बैक या रसूल अल्ला जैसी कट्टरपंथी पार्टी का जन्म हो गया। नवाज शरीफ सरकार ने चाहे जो सफाई दी हो लेकिन उनके हारने में इस विधेयक की भी बड़ी भूमिका थी। शायद इसीलिए इमरान खान ने इस बात को अपने शपथ ग्रहण में शामिल किया ताकि संदेश साफ जाए। लेकिन इससे एक संकेत और जाता है कि इमरान खान की सरकार में शिया अहमदिया अल्पसंख्यक है और उनकी वही हैसियत रहेगी जो इस्लामिक शासन में अल्पसंख्यकों की होती है।

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