युद्ध में अयोध्या और भ्रम में भाजपा

ऐसा बहुत कम होता है जब संघ प्रमुख और भाजपा प्रमुख एक साथ कहीं सार्वजनिक मंच पर दिखाई दें। लेकिन ऐसा तो संभवत: पहली बार हुआ कि ये दोनों अयोध्या के मामले पर बोलने के लिए सार्वजनिक मंच पर आये। एक तरफ भाजपा प्रमुख अमित शाह थे तो दूसरी तरफ संघ प्रमुख मोहन भागवत। दोनों पत्रकार हेमंत शर्मा की लिखी दो किताबों के लोकार्पण के अवसर पर दिल्ली के अंबेडकर इंटरनेशनल सेन्टर में पहुंचे थे। हेमंत शर्मा ने जो दो किताबें लिखी हैं उनमें से एक है ‘युद्ध में अयोध्या’ और दूसरी है ‘अयोध्या का चश्मदीद’।

अयोध्या भारत की आत्मा से जुड़ा हुआ है लेकिन बीते तीन दशक से यह संघ की नीति और भाजपा की राजनीति से भी अनिवार्य रूप से जुड़ा गया है। १९८८ में अयोध्या में शुरु हुई कारसेवा को बीते ३० साल हो गये लेकिन कार्य अभी भी अधूरा है। तीन दशक के इस लंबे अंतराल में बीजेपी की दूसरी पीढ़ी सत्ता में पहुंच गयी लेकिन उसके सामने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का सवाल आज भी ज्यों का त्यों बना हुआ है। आश्चर्यजनक रूप से भाजपा आज भी उसी भ्रम में है जिस भ्रम में वह १९९८ में थी।

बाबरी मस्जिद विध्वंस के साथ ही संभवत: भाजपा ने अयोध्या से अपनी दूरी बनाना शुरु कर दिया था लेकिन जैसे जैसे भाजपा अयोध्या से दूर भागती गयी अयोध्या की परछाई भाजपा के लिए राजनीतिक ग्रहण बनता गया। वह ग्रहण कितना बड़ा है उसका संकेत आज किताब के लोकार्पण में मोहनराव भागवत के भाषण से मिलता है। उन्होंने “जल्द से जल्द अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण” का सिर्फ सुझाव ही नहीं दिया बल्कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को यह चेतावनी भी दी कि अगर ऐसा नहीं होता है तो “जिस समाज ने ताकत (सत्ता) दिया है वह समाज ताकत वापस भी ले सकता है।” भाजपा से लोगों की अपेक्षाओं की तरफ चेतावनी देते हुए मोहन भागवत ने साफ कहा कि आखिर “कब तक टालते रहेंगे?” मोहनराव भागवत के कल विज्ञान भवन में प्रेस कांफ्रेस और आज अंबेडकर इंटरनेशनल में दिये गये वक्तव्य का सार एक ही है, जितना जल्दी हो केन्द्र की भाजपा सरकार राम मंदिर निर्माण की पहल करे, वरना बहुत देर हो जाएगी।

मोहन भागवत अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को भारत के सामाजिक सौहार्द्य के लिए जरूरी मानते हैं। उन्होंने अपने संबोधन में साफ कहा कि “सत्य और न्याय के रास्ते पर चलने से ही भारत के सामाजिक झगड़े खत्म होंगे।” भाजपा अध्यक्ष की मौजूदगी में उन्होंने कहा कि “सवाल जवाब, जांच पड़ताल आदि बंद करो। सीधी सपाट बात करो।” राम मंदिर मुद्दे को संघ परिवार का केन्द्रीय मुद्दा बताते हुए उन्होने स्पष्ट किया कि “यह हमारा कर्तव्य है। सामान्य आदमी बहुत दिन तक इंतजार नहीं कर सकता।”

लेकिन मंच पर मौजूद और मोहनराव भागवत से पहले बोल चुके अमित शाह ने आदतन इस मामले में “कुछ न बोलने” का ही निर्णय लिया। उन्होंने इतना भर कहा कि “सचमुच समय ऐसा नहीं है कि मैं इस मामले में कुछ बोलूं।” उनका संकेत यही है कि राम मंदिर निर्माण को लेकर भाजपा का शीर्ष नेतृत्व फिलहाल कोई पहल करने नहीं जा रहा है। संघ परिवार के किसी प्रकार के दबाव के बाद भी नहीं। संभवत: उनके सत्ता का अंकगणित बिना राम मंदिर निर्माण के पूर्णांक तक पहुंच रहा है इसलिए वो फिलहाल अयोध्या जैसे “विवादित” मामले में हाथ डालने से बचना चाहेंगे।

हालांकि मोहनराव भागवत के पूरे भाषण के दौरान अमित शाह ताली भी बजाते रहे और गंभीर होकर भागवत संदेश भी सुनते रहे लेकिन अकेले अमित शाह के हाथ में क्या है? इस वक्त की जो भाजपा है वह मोदी की भाजपा है। अमित शाह भाजपा में मोदी के नामित अध्यक्ष हैं। अगर मोदी खुद “विवादित” मामलों से अलग हटकर सिर्फ विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ना और जीतने की संभावना देख रहे हैं तो फिर अमिट शाह या पूरी भाजपा क्या कर सकती है? संघ प्रमुख की “चेतावनी” अपनी जगह सही है क्योंकि वो जन सामान्य के भावनाओं की बात कर रहे हैं लेकिन इस बीच ये कहनेवाले कम हैं क्या कि दुनिया राम मंदिर से बहुत आगे निकल चुकी है।

मोदी ने गुजरात में भले ही हिन्दुत्व के आधार पर जनाधार बनाया हो लेकिन बाद के दस साल उन्होंने “विकास” के नाम पर ही शासन किया। उन्होंने सत्ता के लिए जितना जरुरी अफीम चाहिए उससे ज्यादा कभी कहीं इस्तेमाल नहीं किया। उनका यही फार्मूला केन्द्र में भी चल रहा है। बाकी जहां तक धारा ३७० और राम मंदिर जैसे मुद्दे हैं, कम से कम उन्हें मोदी हाथ लगाने के मूड में नहीं हैं। हाल में ही बनारस के दौरे पर गये मोदी ने साफ किया कि आनेवाला चुनाव वो सिर्फ विकास के मुद्दे पर लड़ेंगे। जाहिर है, इससे संघ परिवार और भाजपा के भीतर भी बेचैनी लगातार बढ़ रही है। उस बेचैनी का ही संकेत संघ प्रमुख ने आज अमित शाह की मौजूदगी में दिया। लेकिन अमित शाह की गहरी चुप्पी बता रही थी कि फिलहाल, वो इस बेचैनी से बेचैन होनेवाले नहीं है। इसलिए नहीं कि वो इस बेचैनी को समझते नहीं बल्कि इसलिए क्योंकि यही उनके “आका” का हुक्म है।

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s