जब अल्लाह का नाम भी पाकिस्तान को एक रखने में नाकाम हो जाता है, तब कश्मीर का नारा बुलंद होता है

जब अल्लामा इकबाल ने १९२९ में ब्रिटिश हुकूमत के सामने एक अलग इस्लामिक राज्य की मांग उठाई थी तब उनकी कल्पना में भी नहीं रहा होगा कि अलग राज्य नहीं, इस्लाम के नाम पर अलग राष्ट्र ही बन जाएगा लेकिन उसमें वह कश्मीर ही नहीं होगा जहां वो पैदा हुए थे। जब पाकिस्तान बना तो बात वहीं उसी कश्मीर पर आकर अटक गयी और आज बंटवारे के सत्तर साल बाद भी वही अटकी हुई है। क्या कश्मीर कभी पाकिस्तान को हासिल हो पायेगा?

कभी नहीं। हिन्दूवादियों की तो बात ही जाने दीजिए, कश्मीर की आजादी का नारा लगानेवाले गौतम नौलखा जैसे नक्सली भी प्रधानमंत्री बन जाएं तो कश्मीर की एक इंच जमीन पाकिस्तान को नहीं दे सकेंगे। सवाल ये है कि क्या पाकिस्तान इस बात को नहीं जानता है? बिल्कुल जानता है, और बहुत अच्छे तरीके से जानता है। वह जानता है कि कश्मीर का जो हिस्सा उसके हिस्से आ गया है, वह भी वैधानिक रूप से वह पाकिस्तान में कभी नहीं मिला पायेगा, भारतीय कश्मीर की तो खैर बात ही क्या करना। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर पाकिस्तान इस बात को अच्छी तरह से जानता समझता है तो फिर उसकी “कश्मीर नीति” में सत्तर सालों में कोई बदलाव क्यों नहीं आया?

इसका जवाब कश्मीर पर होनेवाली तकनीकि बहसों में नहीं मिलेगा। इसका जवाब मिलेगा पाकिस्तान के जनमानस में। पाकिस्तान में सेना और सेना द्वारा पैदा किये हुए नेता कश्मीर की बात इसलिए नहीं करते क्योंकि उन्हें जिन्ना की मजार पर कश्मीर का फूल चढ़ाना है। वो इसलिए कश्मीर कश्मीर करते हैं क्योंकि यह उनकी नाकामियों का सबसे कारगर इलाज है। कश्मीर उनकी हर मर्ज की दवा है।

पाकिस्तान एक असफल इस्लामिक राष्ट्र है और अपनी इन्हीं असफलताओं को छिपाने के लिए वह कश्मीर को पाकिस्तान के जेहन में जिन्दा रखे हुए है। अगर पाकिस्तान में शिया सुन्नी का झगड़ा बहुत बढ़ जाए तो कश्मीर सामने कर दिया जाता है। झगड़ा खत्म। तत्काल दोनों पक्ष शांत हो जाते हैं। कश्मीर में बाढ़ आ जाए। लाखों करोड़ों लोग बाढ़ से घिर जाएं और सरकार पूरी तरह से विफल हो जाए तो वह सबको राहत सामग्री भिजवाने की बजाय कश्मीर पर कोई मजबूत बयान दे देगा। लोग बाढ़ और विपत्ति में घिरे होने का अहसास भूल जाएंगे।

पाकिस्तान की एक बहुत बड़ी आबादी को पाकिस्तानी सरकार से कुछ नहीं चाहिए, सिर्फ कश्मीर चाहिए। जो सरकार ऐसा करते हुए दिखती है, पूरा पाकिस्तान अपने सारे मतभेद भुलाकर उसके साथ खड़ा हो जाता है। उन्हें अपनी दरिद्रता का कोई दुख नहीं रह जाता। उन्हें अपनी सरकारों से भी कोई शिकायत नहीं रह जाती। बस उन्हें ये पता चलना चाहिए कि कश्मीर में जो “आजादी की लड़ाई” चल रही है, पाकिस्तानी सरकार उसे पूरी मदद कर रही है। अब सवाल ये है कि कश्मीर को लेकर पाकिस्तान की यह मानसिकता कैसे बनी? क्या पाकिस्तान मूवमेन्ट के वक्त ही पंजाब कश्मीर के लिए इस तरह दीवाना था या फिर यह दीवानगी बंटवारे के बाद पैदा हुई?

कश्मीर का पंजाब से कामकाजी रिश्ता ऐतिहासिक रूप से रहा है। खासकर सिखों के शासन के दौरान। पंजाब से लोग कश्मीर जाकर बसे और कश्मीर से निकलकर भी लोग पंजाब में बसे। बंटवारे के बाद जब पंजाब के दो टुकड़े हुए तो मुसलमानों का एक वर्ग ऐसा भी पंजाब में दर बदर हुआ जो मूलत: कश्मीरी था। इसमें शायर मोहम्मद इकबाल भी थे तो नवाज शरीफ का खानदान भी था। ये लोग भले ही पंजाब में आकर रच बस गये हों लेकिन दो चार पीढ़ी पहले ये कश्मीर में ही थे। लेकिन सिर्फ इतने जुड़ाव की वजह से ही पाकिस्तान कश्मीर की मांग नहीं करता। इससे बड़ी वजह है इस्लाम। मुसलमान को अगर यह बता दिया जाए कि उसके अगुआ कोई इलाका कब्जा करने में लगे हैं तो वह अपनी हर समस्या भूलकर अपने मुखिया की मदद करना शुरु कर देता है। भारतीय उपमहाद्वीप में यह एक आम मुसलमान की मानसिकता है। उसकी विस्तारवादी सोच उसे हर तकलीफ उठाने के लिए तैयार करती है, बस उसका शासक या अगुआ विस्तारवाद को अल्लाह के बताये रास्ते पर ठीक तरह से आगे बढ़ा रहा हो।

पाकिस्तान में मुसलमानों का यही वह मानस है जिसे पाकिस्तान के शासक बहुत अच्छे से समझते हैं, इसलिए यह जानते हुए भी कि वो भारतीय कश्मीर को कभी हासिल नहीं कर पायेंगे, उन्होंने कश्मीर की आग को कभी बुझने नहीं दिया है। उन्हें मालूम है जिस दिन कश्मीर में ये आग बुझी, पाकिस्तान जलकर खाक हो जाएगा। एक देश के रूप में पाकिस्तान की हर नाकामी पर पर्दा पड़ा रहे इसके लिए जरूरी है कि पाकिस्तान में कश्मीर के आजादी की आग धधकती रहे। इसलिए सेना सत्ता संभाले या फिर सेना की मर्जी से कोई राजनीतिक दल। पाकिस्तान में कश्मीर की आग कभी कमजोर नहीं पड़ने दी जाती। इस आग को जलाये रखने के लिए फौज से लेकर मुल्ला मौलवियों की फौज तक सब काम पर लगे रहते हैं। सत्तर साल से पाकिस्तान के हुक्मरान इसी तरह से अपनी जनता को धोखा दे रहे हैं। बुरहान वानी को आजादी का हीरो बताकर पाकिस्तानी हुक्मरानों ने अपनी ही आवाम को फिर वही धोखा दिया है, जो सत्तर साल से देते आये हैं।

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