आस्था का फैसला अदालत में क्यों?

केरल के शबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अपना फैसला सुना दिया। सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमित देते हुए कहा है कि भक्ति में भेदभाव नहीं होना चाहिए। लेकिन क्या सचमुत शबरीमाला मंदिर में भेदभाव होता था? जिसे सुप्रीम कोर्ट भेदभाव कह रहा है, वह भेदभाव था या फिर कोई व्यवस्था?

सबसे पहले तो ये समझने की जरूरत है कि मस्जिद और चर्च की तरह मंदिर कोई प्रार्थनाघर नहीं है। मंदिर देवालय होते हैं। देवालय मतलब किसी न किसी देवता का घर। जो भी प्रसिद्ध मंदिर हैं उनकी प्राण प्रतिष्ठा जिस रूप में की गयी है, उसके साथ वैसी ही विशिष्टता जुड़ जाती है। जो लोग ये समझते हैं कि सब मंदिर एक जैसे होते हैं उन्हें मंदिरों की स्थापना, संरचना के बारे में कुछ नहीं पता। इसलिए हर देवालय की अपनी कुछ विशिष्टता होती है। मसलन, सबरीमाला मंदिर में जो भगवान अयप्पा हैं उनके बारे में कहा जाता है कि वो देवरूप में भी ब्रह्मचारी हैं। इसलिए बारह साल से अधिक और पचास साल की उम्र तक की महिलाएं मंदिर में प्रवेश नहीं पा सकतीं।

इसी तरह राजस्थान के पुष्कर मंदिर में विवाहित पुरुषों का प्रवेश वर्जित है। केरल के ही तिरुअनन्तपुरम में देवी मंदिर को नारी शबरीमाला के रूप में जाना जाता है और इस मंदिर में पुरुषों का प्रवेश वर्जित है। अत्तुकल भगवती मंदिर को पार्वती से जुड़ा मंदिर माना जाता है। तमिलनाडु के कन्याकुमारी मंदिर में भी पुरुषों का प्रवेश वर्जित है। इन मंदिरों में पुरुषों का प्रवेश वर्जित होने के कारण क्या ये मान लिया जाए कि ये मंदिर पुरुषों के खिलाफ भेदभाव करते हैं?

इसे भेदभाव मानने की बजाय मंदिर की आस्था से जुड़ी व्यवस्था मानना चाहिए। ऐसे ही हर मंदिर के अपनी कुछ व्यवस्थाएं हैं इसलिए समाधि, मजार और मंदिर इन तीन जगहों पर जो व्यवस्थाएं बनायी जाती हैं उनका सम्मान करना चाहिए। उन व्यवस्थाओं के धार्मिक और आध्यात्मिक कारण होते हैं। उनके बारे में इतना सरलीकरण नहीं करना चाहिए कि उनका महत्व ही खत्म हो जाए।

इन सबसे आगे, किसी अदालत को धार्मिक मामलों में दखल देने से ही बचना चाहिए। शबरीमाला का ही उदाहरण लीजिए। मान लीजिए वहां महिलाएं जाएं और एक दो के साथ भी अनिष्ट हो गया तो क्या महिलाएं उसके बाद वहां जाएंगी? आस्था से जुड़े मामलों को आस्था के स्तर पर देखना समझना चाहिए। इसमें न्यायालय या जेन्डर जस्टिस एक्टिविस्ट दखल न दें तो ज्यादा सुभीता होगा।

जहां तक धर्म सुधार की बात है तो यह काम भी कोई धार्मिक व्यक्ति ही करे तो ज्यादा सही रहता है। मसलन स्त्रियों के सन्यास लेने पर रोक है। इसके अपने कारण हैं। मसलन एक तरफ महिलाओं को सन्यासी बनाने पर रोक है तो दूसरी तरफ कई ऐसे मठ और संप्रदाय हैं जहां महिलाओं को सन्यास की दीक्षा दी जाती है। जिन सन्यासियों को जैसा ठीक लगता है, वैसा करते हैं।

अगर कुछ रुढ़ि है तो वह भी धर्म समाज ही तोड़ेगा। सनातन धर्म बहुत जीवंत व्यवस्था है। इसमें आयी जड़ता से भी यह खुद बाहर निकलना जानता है। लेकिन इसी जड़ता को तोड़ने के नाम पर कानून बनाकर थोपना शुरु कर देंगे तो यह सीधे सीधे संविधान प्रदत्त धार्मिक आजादी में राज्य का दखल ही समझा जाएगा, कुछ और नहीं। आस्था से जुड़े फैसले अदालत में नहीं होने चाहिए। तब तो बिल्कुल भी नहीं जब मामला मिल्कियत से जुड़ा हुआ न हो।

जहां तक शबरीमाला मंदिर पर स्त्रियों के साथ भेदभाव का आरोप है तो सुप्रीम कोर्ट ने संभवत: यह जानकारी किसी ने नहीं दी कि तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता बीमार पड़ीं तो इसी अयप्पा मंदिर में रोज चार हजार लोगों को अन्नादान किया गया ताकि वो जल्द से जल्द स्वस्थ हो जाएं। अगर शबरीमाला मंदिर स्त्री विरोधी होता तो ये काम कभी करता?

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s