भाजपा के दलित बनाम बसपा के ब्राह्मण

लखनऊ में यूपी पुलिस द्वारा विवेक तिवारी की हत्या के बाद उपजे आक्रोश पर मायावती ने नयी राजनीति का पांसा फेंक दिया है। मायावती ने लखनऊ में मीडिया से बात करते हुए योगी आदित्यनाथ की भाजपा सरकार पर आरोप लगाया कि वह लगातार सवर्णों खासकर ब्राह्मणों का शोषण कर रही है। केन्द्र की भाजपा सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटकर नये सिरे से दलित एक्ट लागू किये जाने के बाद मायावती का यूपी के ब्राह्नण वोटरों की तरफ फेंका गया अब तक का सबसे बड़ा पांसा है।

भाजपा द्वारा सवर्णों और पिछड़े वर्ग के खिलाफ दलित एक्ट लगाये जाने के बाद भी मायावती ने कहा था कि ‘जैसे मैंने इस एक्ट को लागू किया था अगर वैसे भाजपा सरकार भी लागू करे तो इसका दुरुपयोग नहीं होगा।’ उनका यह बयान सवर्णों को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए पर्याप्त था। मायावती ने मुख्यमंत्री रहते हुए ऐसे प्रावधान किये थे कि दलित एक्ट में बिना जांच के गिरफ्तारी संभव नहीं ही नहीं थी। इसके कारण यूपी में इस कानून के दुरुपयोग को रोकने में मदद मिली थी। मायावती ने ये कदम तब उठाया था जब उन्हीं के राज में इस कानून का जमकर दुरुपयोग होने लगा था।

लेेकिन भाजपा ने सब पलटकर वापस दलित एक्ट को पुरानी व्यवस्था में लागू कर दिया। इससे यूपी में सवर्णों का नाराज होना स्वाभाविक है। लेकिन उनके सामने समस्या ये है कि भाजपा से नाराज होकर भी वो जाएं तो कहां जाएं? सवर्ण जातियां धर्मनिष्ठ हैं और राम मंदिर आंदोलन के कारण वो तेजी से भाजपा की तरफ आयी थीं। २०१४ में नरेन्द्र मोदी की आंधी में तो कोई सवर्ण वोटर शायद ही बचा हो जिसने मोदी के नाम पर वोट न किया हो। इसका परिणाम ये हुआ कि २०१४ में मोदी को जोरदार जीत मिली और उत्तर प्रदेश से मायावती का सफाया हो गया। लेकिन जीत के बाद जहां मोदी ने दलितों को अपना कोर वोटर बनाने की मुहिम शुरु कर दी वहीं सवर्णों के लिए कहा जाने लगा कि उनके सामने विकल्प क्या है?

भाजपा नेताओं का ये कहना सही था कि इन सवर्ण हिन्दूवादियों के सामने विकल्प क्या था? कांग्रेस अपनी तरफ से कोशिश कर रही है लेकिन उसकी यूपी में न जड़ बची है और न जमीन। रही सही कसर राहुल गांधी की नेतृत्व पूरी कर देती है। समाजवादी पार्टी में यादव प्रभुत्व इतना हावी है कि ठाकुर वोटर उधर जाए तो जाए ब्राह्मण वोटरों ने अब तक उधर का रुख नहीं किया है। इसके दो कारण हैं। एक तो राम मंदिर आंदोलन में मुलायम सिंह यादव की खलनायक वाली भूमिका, दूसरा यादव और मुसलमानों का समाजवादी पार्टी में प्रभाव। ऐसे में यूपी में ब्राह्मणों के सामने भाजपा के अलावा अगर कोई विकल्प बचता है तो वह बहुजन समाज पार्टी ही है।

मायावती ने प्रदेश के १४ प्रतिशत ब्राह्मण मतदाताओं की इस दिशाहीनता को भांप लिया है और तत्काल उन्हें अपनी तरफ मोड़ने में जुट गयी हैं। जाहिर है, इस काम में सतीश चंद्र मिश्रा उनके लिए फिर एक बार वैसे ही मददगार साबित होंगे जैसे पहले हो चुके हैं। लेकिन मायावती ने बसपा के इस ब्राह्मण कार्ड से एक और दांव चला है। उन्होंने बीजेपी को भी जवाब दिया है कि अगर तुम हमारे परंपरागत वोटबैंक में सेंध मार सकते हो तो हम तुम्हारे वोटबैंक में क्यों नहीं?

अगर मायावती ब्राह्मण वोटबैंक में सेंधमारी करने में कामयाब हो जाती हैं तो २०१९ के आमचुनाव में वो अकेले भी भाजपा तो कड़ी टक्कर देने में कामयाब हो जाएंगी। चार साल के शासन में केन्द्र की मोदी सरकार की सवर्ण वोटरों के प्रति ऐसी कोई उपलब्धि नहीं है जिसे दिखाकर वो अपने लिए वोट मांग सकें। रही सही कसर योगी की ब्राह्मण विरोधी छवि पूरा कर देगी। हालांकि योगी के ब्राह्मण विरोधी छवि से निपटने के लिए प्रदेश अध्यक्ष से लेकर उप मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पर ब्राह्मण बिठा रखा है लेकिन ये ब्राह्मण नेता रबर स्टैंप से ज्यादा अहमियत रखते नहीं। महेन्द्र पांडेय हों या दिनेश शर्मा। इनकी छवि मोहल्ले और जिले के नेता से ज्यादा नहीं है। इन नेताओं से ज्यादा ताकतवर तो सतीश चंद्र मिश्रा हैं जो बसपा में हैं।

इसलिए मायावती का यह दांव बिल्कुल खाली जाएगा, यह कहना बेवकूफी होगी। वो प्रदेश में नयी राजनीति को पैदा कर रही हैं जिसके जरिए खत्म हो चुकी उनकी राजनीति का भी पुनर्जन्म हो सकता है।

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