सनातन गांधीवाद

गांधी कुरुपता की हद तक बदसूरत थे। उनमें नायक दिखने जैसा कुछ नहीं था। इकहरा बदन जिसे उनकी प्राकृतिक चिकित्सा ने और दुबला पतला कर दिया था। आवाज भी बहुत आकर्षक न थी। लिखते तो ऐसे थे जैसे कोई नौसिखिया लिखता हो। सीधी, सपाट या फिर गद्य के मानकों पर कहें तो अनगढ़। फिर भी वो नायक ही नहीं महानायक बने। उनकी वाणी ने जितने लोगों को प्रभावित किया उतना दो हजार साल में भारत में किसी की वाणी ने प्रभावित नहीं किया। उनका लिखा धर्मशास्त्र की तरह पढ़ा और ग्रहण किया गया।

तो फिर गांधी में ऐसा क्या था जिसने उन्हें महामानव बना दिया? आखिर ऐसा क्या है कि जैसे जैसे समय बीत रहा है गांधी की परछाई पूरे मानव जाति को अपने प्रभाव क्षेत्र में ढंकती जा रही है?

नारायण भाई देसाई अपनी गांधी कथा में कहते थे मेरे पिताजी (महादेव भाई देसाई, जो कि गांधी के निजी सचिव थे।) को गांधी जी में कुछ अवतारी शक्ति नजर आती थी। अकेले महादेव भाई देसाई ही नहीं, चंपारण के राजकुमार शुक्ल में भी गांधी में कोई दैवीय शक्ति दिखाई दी थी इसलिए उन्होंने गांधी से कहा था, आप ही हैं जो हमें हमारे कष्टों से मुक्ति दिला सकते हैं।

गांधी जी ने यह दैवीय शक्ति अपने कर्म से अर्जित किया था। वह कर्म जिसे सत्य की साधना कहते हैं। बिना कहीं हिमालय में गये वो सत्य और अहिंसा के महान यौगिक सिद्धांतों को साधने में सफल रहे। कर्म और वचन से ही नहीं संभवत: मन में भी उनके झूठ और हिंसा न बची थी इसलिए वो एक चुंबकीय शक्ति बन गये। जो उनके आसपास आता, उनसे बंध जाता।

आज सत्तर साल बाद, या फिर आनेवाले सात सौ साल बाद भी गांधी नाम में यह चुंबकीय शक्ति विद्यमान रहेगी। जो भी सत्य और अहिंसा के रास्ते कर्म, वचन और सबसे कठिन मन से चलेगा, वह गांधी के करीब पहुंच जाएगा। एक चुंबकीय शक्ति धारण कर लेगा। अगर गांधीवाद जैसा कुछ है तो वह यही है सत्य और अहिंसा का शास्वत भारतीय सिद्घांत। इसके रास्ते में कठिनाइयां बहुत हैं लेकिन मानव जाति की आखिरी जरूरत शांति इसी रास्ते से प्राप्त की जा सकेगी।

यही सनातन गांधीवाद है जो गांधी के समय में भी प्रासंगिक था और आज भी प्रासंगिक है और आनेवाले समय में भी प्रासंगिक रहेगा। इस गांधीवाद में कभी कोई क्षरण नहीं आयेगा। यह सत्य सदैव सनातन रहेगा।

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