गाज़ियाबाद से ग़ाज़ीपुर: बदलाव की लिस्ट लम्बी है

बात उस समय की है जब दिल्ली से सटा लोनी एक बड़ा नगर होता था. आज से करीब तीन सौ साल पहले. नगर तक पहुंचने के लिए जो द्वार बनाया गया था उसे कोटद्वार कहते थे. लोनी नगर मुस्लिम आक्रांताओं की मार सहता रहा और लहुलूहान होता रहा. उसी काल में कोटद्वार भी ध्वस्त हुआ और उस कोटद्वार पर जो शहर बसा उसे हम आज दिल्ली से सटे गाजियाबाद के नाम से जानते हैं.

गाजियाबाद ही वह शहर है जहां से उत्तर प्रदेश की शुरुआत होती है. उत्तर प्रदेश के वाणिज्यिक और औद्योगिक उत्पादन का महत्वपूर्ण केन्द्र. यहां से लेकर पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर तक आपको हर जगह इस्लामिक आक्रमण और विध्वंस के निशान नामों के रूप में हर तरफ मिल जाएंगे. मसलन, उत्तर प्रदेश का कुशभवनपुर कब सुल्तानपुर हो गया, हमें नहीं मालूम. आज हमारे लिए वह सिर्फ सुल्तानपुर है. इसी तरह जिलों के स्तर पर प्रदेश में कुल १३ जिले ऐसे हैं जिनका नाम या तो बदल दिया गया या फिर उन्हें किसी न किसी आक्रांता ने अपनी निशानी के तौर पर रखा. देश में इकलौता उत्तर प्रदेश ऐसा राज्य है जहां सबसे ज्यादा पौराणिक और ऐतिहासिक नामों से छेड़छाड़ की गयी. इसके बाद बिहार का नंबर आता है.

इन्हीं दो जगहों पर हिन्दुओं से जुड़े सबसे ज्यादा पौराणिक स्थान थे इसलिए इन्हीं दो जगहों पर सबसे ज्यादा बदलाव किये गये. इलाहाबाद के अलावा गाजियाबाद, अलीगढ़, आजमगढ़, फैजाबाद, फरुखाबाद, फतेहपुर, फिरोजाबाद, जौनपुर, मुरादाबाद, मुजफ्फरनगर, शाहजहांपुर और सुल्तानपुर. इन सभी जिलों के नाम किसी न किसी मुस्लिम आक्रांता ने उन स्थानों की पौराणिक और वास्तविक पहचान छिपाने के लिए रखे या फिर बदल दिये. इसके अलावा उत्तर प्रदेश में रसूलपुर, मोहम्मदपुर या फिर मोहम्मदाबाद नामक गांव या कस्बे तो हर जिले में दो चार मिल जाएंगे जो मुसलमान शासकों ने अपने पैगंबर की याद में रखे थे.

उन्होंने ये सब अनायास तो नहीं किया होगा. इसके पीछे उनकी मंशा क्या रही होगी इसे आसानी से समझा जा सकता है. लेकिन हमारे सामने सवाल ये है कि क्या इन नामों को इसलिए बदल देना चाहिए क्योंकि मुगलों ने रखे थे या फिर इसलिए क्योंकि ये इस्लामिक पहचान रखते हैं. यह जटिल प्रश्न है. इसे कुछ इस तरह से पेश किया जाएगा कि मानों इसे हटाने का मतलब इस्लामिक पहचान मिटाने का प्रयास है. कुछ हद तक ही ये बात सही है. लेकिन असल सवाल तो ये है कि भारत में मुसलमान की इस्लामिक पहचान क्या है? क्या अरबी नामों को जस का तस रखकर स्थानीय पहचान को मिटा देना इस्लामिक पहचान है या फिर स्थानीय नाम ही मुसलमान की भी इस्लामिक पहचान है?

जहां तक नाम का संंबंध है तो उसका संबंध हमेशा स्थानीय पहचान से ही होता है. भारत में ही उत्तर से लेकर दक्षिण तक और पूरब से लेकर पश्चिम तक नामों की ऐसी विविधताभरी विशिष्टता है कि सिर्फ नाम से ही हमें उस स्थान के बारे में पता चल जाता है कि हम देश के किस हिस्से के बारे में बात कर रहे हैं. कोई हमारे सामने थिंपू कहेगा तो हमारे मन में दक्षिण या पश्चिम का नक्शा नहीं उभरेगा. हमें उत्तर पूर्व का आभास होगा. इसी तरह थिरुअनन्तपुरम् कहते ही हमारा मन दक्षिण पहुंच जाता है. ऐसे में औरंगाबाद चाहे तो महाराष्ट्र में हो या फिर बिहार में, वह हमें उस स्थान की कोई विशिष्ट पहचान नहीं देता. नाम लेने के बाद हमें यह भी बताना पड़ता है कि यह किस राज्य में है. ऐसे नामकरण औपनिवेशिक गुलामी के प्रतीक तो हो सकते हैं लेकिन स्थानीय पहचान से जुड़े हुए कभी भी नहीं.

शासकों या कई बार महापुरुषों के नाम पर भी नामकरण करने से स्थानीय पहचान नष्ट होती है. इसलिए इसे हिन्दू मुसलमान नाम के रूप में देखने की बजाय उस जगह के स्थानीय पहचान और पौराणिक महत्व से जोड़कर देखना चाहिए. मोहम्मद कोई इस्लामिक नाम नहीं है. मोहम्मद अरबी नाम है जो मुसलमानों के पैगंबर का भी नाम था. आप सोचिए जब उन्होंने इस्लाम की शुरुआत ही चालीस साल की उम्र में किया तो उनका अपना नाम मोहम्मद इस्लामिक नाम कैसे हो सकता है? यह नाम तो इस्लाम शुरु होने से पहले भी अरब में इस्तेमाल होता था. इसलिए भारत में जो इस तरह के नाम दिये गये हैं उनका इस्लाम से नहीं, बल्कि अरब संस्कृति से नाता जरूर है. ऐसे में सवाल उठता है कि सूदूर भारत के किसी जिले या गांव का नाम अरबी संस्कृति के अनुसार क्यों होना चाहिए? इसका तुक क्या है?

यह एक बेतुकी बात है जिसे भारत में उर्दू फारसी के महान शायर मोहम्मद इकबाल समझते थे इसलिए १९२९ में इसी इलाहाबाद शहर में जब उन्होंने मुस्लिम लीग के बैनर तले ब्रिटिश हुकूमत के सामने एक अलग ‘इस्लामिक राज्य’ का खाका पेश किया था तो उस समय यह भी कहा था कि वह इस्लामिक राज्य अरब की भद्दी नकल नहीं होगा बल्कि हिन्दुस्तानी इस्लाम होगा. पाकिस्तान समर्थक मुसलमानों ने पाकिस्तान तो ले लिया लेकिन उस पाकिस्तान को उन्होंने सच्चे इस्लाम के नाम पर अरब भद्दी नकल ही बना दिया. सवाल हमारे सामने है. क्या भारत में भी हिन्दुस्तानी इस्लाम की वही सूरत होना चाहिए जो पाकिस्तान में है? या फिर मुसलमानों को भी स्थानीय जड़ों में अपनी पहचान खोजनी चाहिए जैसे बाकी दूसरे लोग करते हैं.

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