करतारपुर कॉरीडोर से आगे

रेडक्लिप पहली बार भारत आया था एक ऐसे काम के लिए जिससे एक देश में दो देश बनने थे। रेडक्लिफ ने मैप उठाया और लाइन खींच दी। इस तरह भारत पाकिस्तान का जन्म हो गया। किसी को कुछ होश नहीं था कि पाकिस्तान में क्या जा रहा है और भारत क्या पा रहा है।

करतारपुर ऐसी ही एक जगह थी जिस पर धर्म के नाम पर भारत का स्वाभाविक हक था। जहां रेडक्लिफ ने लाइन खींची उस लाइन से सिर्फ दो किलोमीटर दूर करतारपुर गुरुद्वारा पाकिस्तान में चला गया और सिक्ख भारत में रह गये। जाने को तो सिक्खों का लाहौर और ननकाना साहिब भी चला गया था लेकिन इतने करीब से करतारपुर का जाना ज्यादा दुखद था।

करतारपुर में ही गुरु नानक सबसे लंबे समय तक रहे और यहीं पर देहत्याग भी किया। इसलिए इस स्थान का महत्व सिक्ख समुदाय के लिए सर्वाधिक महत्व के स्थान में है। उनकी श्रद्धा अब बार्डर इस पार से सिर्फ गुरुद्वारा दर्शन करके ही प्रकट हो पाती थी। वो चाहकर भी गुरुद्वारे तक नहीं जा सकते थे क्योंकि वह अब अलग देश है। लेकिन भारत पाकिस्तान सरकारों ने करतारपुर कारीडोर को मंजूरी देकर इस समस्या को खत्म कर दिया है। अब सिक्ख बिना वीजा पासपोर्ट के करतारपुर जा सकेंगे। करतारपुर से डेरा नानक के बीच एक चार किलोमीटर का कॉरीडोर बनेगा जिसमें सामान्य जांच पड़ताल के बाद सिक्ख करतारपुर गुरुद्वारे तक आ जा सकेंगे।

दोनों ही देशों की तरफ से आनेवाले दो चार दिनों में इस परियोजना की आधारशिला रख दी जाएगी और कुछ महीनों में ही सारी जरूरतें पूरी करके आवाजाही शुरु कर दी जाएगी। लेकिन क्या इतना करने से ही समस्या का समाधान हो जाएगा? आज अगर भारतीय सिक्खों के एक वर्ग में खालिस्तान मूवमेन्ट जिन्दा है और उस मूवमेन्ट को पाकिस्तान मदद कर रहा है तो इसका कारण ये है कि न चाहते हुए भी सिक्खों का भावनात्मक संबंध उस जमीन से ज्यादा है जिसे पाकिस्तान बना दिया गया। सिक्ख चाहें न चाहें उन्हें पाकिस्तान जाना ही पड़ेगा क्योंकि उनकी धार्मिक और शासकीय विरासत का इतिहास भारत से ज्यादा पाकिस्तान में बिखरा पड़ा है।

ननकाना साहिब हो कि करतारपुर साहिब या फिर लाहौर ये सब सिक्ख विरासत का हिस्सा हैं। पाकिस्तान के शासक इस विरासत से लगाव का दुरुपयोग सिक्खों को भारत के खिलाफ भड़काने के लिए करते हैं तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। पाकिस्तान के कट्टरपंथी इस्लामी नेताओं द्वारा करतारपुर कॉरीडोर का जिस तरह से स्वागत किया जा रहा है वह सिर्फ सांप्रदायिक सद्भाव भर नहीं है। इसके पीछे नीतिगत और कूटनीतिक रणनीति भी काम कर रही है। उन्हें लगता है कि सिखों को भावनात्मक रूप से अपने साथ जोड़कर वो खालिस्तान मूवमेन्ट को नये सिरे से जिन्दा कर सकते हैं।

किसी दुश्मन देश का ऐसा सोचना उसका स्वाभाविक कर्म है। भारत सरकार को सतर्क और सावधान दोनों रहना होगा। इसका एक रास्ता तो ये भी हो सकता है कि सरकार अगर बाबा नानक से जुड़े करतारपुर को भारत में शामिल कर ले तो भविष्य में सिख आतंकवाद के उभार की संभावनाओं पर भी रोक लग जाएगी। इसके लिए भारत चाहे तो बांग्लादेश की तरह ही पाकिस्तान सरकार से भी जमीनों की अदला बदली कर सकती है। भारत पाकिस्तान बॉर्डर पर कम से कम दो स्थान ऐसे हैं जिसे जमीनों की अदला बदली या फिर कोई कीमत देकर भी हासिल की जा सकती है।

सीमा के बिल्कुल बगल में एक करतारपुर है तो दूसरा शारदा पीठ। ये दोनों स्थान पाकिस्तान के लिए किसी ऐतिहासिक महत्व के नहीं है लेकिन भारतीय लोगों का इतिहास और भावनात्मक संबंध इन दो जगहों से जुड़ा हुआ है। भारत सरकार को इसके लिए पाकिस्तान से कूटनीतिक बातचीत शुरु करके रेडक्लिफ की मूर्खताओं को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। यह करतारपुर कॉरीडोर से आगे का रास्ता है जिसे भारत सरकार को पूरा करना चाहिए। यह इतना आसान तो बिल्कुल नहीं होगा जितनी आसानी से कह दिया गया है लेकिन जटिल समस्याओं का समाधान आसान होता भी कहां है?

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