मोदी के मिस्टर टेन परसेन्ट

आसिफ अली जरदारी पाकिस्तान के राष्ट्रपति रहे लेकिन उससे भी पहले वो पाकिस्तान की प्रधानमंत्री रहीं बेनजीर भुट्टो के पति रहे। जिन दिनों बेनजीर भुट्टो प्रधानमंत्री रहीं उन दिनों आसिफ अली जरदारी को ‘प्यार से’ मिस्टर टेन परसेन्ट कहा जाता था। यह प्यार उन्हें इसलिए हासिल था क्योंकि उनके बारे में कहा जाता था कि किसी भी बड़े ठेके पट्टे में वो अपना दस प्रतिशत कमीशन पक्का रखते थे। बेनजीर की मौत के बाद जब जरदारी पाकिस्तान के राष्ट्रपति बने तो उन्होंने बहुत कोशिश की कि उनके दामन से ये टेन परसेन्ट का दाग हट जाए, लेकिन वो कामयाब हो नहीं पाये। हालांकि यहां जरदारी का जिक्र करने का मतलब ये नहीं कि हम पाकिस्तान या भ्रष्टाचार की कोई बात करने जा रहे बल्कि मतलब सिर्फ टेन परसेन्ट से है।

यह टेन परसेन्ट कम से वर्तमान समय में सर्वाधिक चर्चा का विषय बना हुआ है। लेकिन ऐसा नहीं है कि यह टेन परसेन्ट भविष्य को प्रभावित नहीं करेगा। कोई आश्चर्य नहीं कि यह दस प्रतिशत भारत में एक ऐसी लकीर खींच दे कि एक वर्ग का नामकरण ही मिस्टर टेन परसेन्ट हो जाए, वैसे ही जैसे पाकिस्तान में जरदारी टेन परसेन्ट के नाम से मशहूर हो गये थे। जरदारी चाहकर भी आज तक अपने ऊपर से टेन परसेन्ट का दाग हटा नहीं पाये हैं, अगर भारत में एक वर्ग पर यह ठप्पा लग गया तो क्या वो फिर कभी इसे धो पायेंगे?

कहने के लिए भले ही केन्द्र की मोदी सरकार ने आरक्षित वर्ग के बाहर की जातियों, धर्मों और संप्रदायों को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आर्थिक आधार पर १० प्रतिशत आरक्षण दिया है लेकिन इसका सामाजिक प्रभाव बिल्कुल नहीं होगा, यह कहना मूर्खता होगी। आधार भले ही आर्थिक लिया गया हो लेकिन इसका असर सामाजिक होगा। तब क्या वो वर्ग जो अब तक एससी/एसटी जातियों और अन्य पिछड़ा वर्ग को दिये जाने वाले आरक्षण का यह कहकर विरोध कर रहे थे कि आरक्षण दीमक की तरह व्यवस्था को चाट रहा है, क्या अब यही तर्क दे पायेंगे? अब न कोई धर्म बचा और न कोई जाति जो आरक्षण के दायरे में न आ गयी हो, फिर सवाल उठता है कि गुणवत्ता की बहस अब कहां जाकर जगह पायेगी?

मोदी चौंकानेवाले प्रधानमंत्री हैं। शायद देश दुनिया को चौंकाने में उन्हें मजा आता है इसलिए वो बड़े फैसले अचानक से करते हैं। चाहे नोटबंदी हो या फिर अब गरीब अगड़ों को आरक्षण। ये दोनों ही फैसले अचानक से ही लिये गये। हो सकता है मोदी के मन में ये बातें लंबे समय से रही हों लेकिन सरकारी व्यवस्था में मन की बात को यथार्थ के धरातल पर उतारने की एक प्रक्रिया होती है। उस प्रक्रिया में कुछ लोग होते हैं और एक समयसीमा भी होती है। लेकिन जैसे आनन फानन में नोटबंदी की गयी, कुछ उसी अंदाज में अगड़ों को आरक्षण देने का फैसला किया गया। मात्र चौबीस घण्टों में कैबिनेट सचिवालय ने नोट बनाया और सरकार ने उसे लोकसभा में पेश कर दिया। कैबिनेट नोट बनने, कैबिनेट में प्रस्ताव पारित होने और दोनों सदनों से पास कराकर राष्ट्रपति के पास भेजने में कुल ७२ घंटे का समय लगा। आप कह सकते हैं कि यह भारत का संभवत: सबसे तेज संविधान संशोधन था जिसके बाद आरक्षण की अब तक की सभी धारणाओं को उलट पुलट दिया गया।

बीते कुछ सालों से सोशल मीडिया पर एक बहस आम है कि जाति के आधार पर आरक्षण देने की बजाय आर्थिक आधार पर दिया जाए। कहने की जरूरत नहीं कि यह बहस ज्यादातर उस वर्ग के लोग चला रहे थे जो सामान्य वर्ग से संबंध रखते हैं। मोदी के इस ताजा संविधान संशोधन से उनकी यह मांग पूरी हो गयी। अब तक जितनी राज्य सरकारों या स्वयं केन्द्र सरकार ने भी आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की कभी कोशिश की तो अदालतों में इसलिए धराशायी हो गया क्योंकि संविधान में इसका प्रावधान ही नहीं था। मोदी सरकार ने अब वह आधार संविधान में जोड़ दिया है। इसलिए इस बात की संभावना कम है कि अदालत में इस आरक्षण को असंवैधानिक ठहरा दिया जाएगा। अदालतें कानून नहीं बनाती, कानून की समीक्षा करती हैं। अगर संविधान में ही संशोधन हो गया तो फिर अदालतों के पास इस प्रस्ताव को खारिज करने का कोई कारण नहीं होगा, सिवाय इसके कि सुप्रीम कोर्ट संवैधाविक संशोधन को ही असंवैधानिक मान ले।

इसलिए अब भारत में पहली बार आर्थिक स्थिति को आरक्षण का अधिकार मान लिया गया है। जो लोग इसकी मांग कर रहे थे उन्हें मजबूत आधार मिल गया है। सामान्य वर्ग में आरक्षण का यह प्रावधान एक तरह के क्रीमी लेयर जैसा है जिसमें जाति धर्म का कोई बंधन नहीं रखा गया है। आठ लाख से कम आय वाले सामान्य वर्ग के नौजवान के सामने यह अवसर होगा कि वह आरक्षित वर्ग में आवेदन करे या फिर सामान्य वर्ग में। अगर वह आरक्षित वर्ग में आवेदन करने के बाद भी अंक तालिका में मेरिट लाता है तो ओबीसी की तरह सामान्य वर्ग में चयनित हो सकेगा और उसकी जगह सामान्य आरक्षित वर्ग से किसी और को भर्ती कर लिया जाएगा जैसे ओबीसी भर्तियों में होता है। इसलिए यह कहना कि बहुसंख्यक सामान्य वर्ग को १० प्रतिशत में समेटकर छोटे से सामान्य वर्ग के लिए बड़ा हिस्सा रख दिया गया है, बिल्कुल गलत और मिथ्या प्रचार भर है।

लेकिन यहां से देश में आरक्षण की बहस में निर्णायक बदलाव जरूर आयेंगे। पहला, अगर सामान्य वर्ग में, ओबीसी में क्रीमी लेयर हो सकता है तो फिर एससी/एसटी में क्यों नहीं हो सकता? अगर सामान्य वर्ग में मुस्लिम और ईसाई शामिल हो सकते हैं तो फिर दलितों के आरक्षण में मुसलमान और ईसाईयों को हिस्सा क्यों नहीं दिया जा सकता? ऐसे बहुत से सवाल हैं जो आगे विमर्श के लिए उठेंगे। इसलिए मोदी के इस प्रावधान से सामान्य वर्ग के गरीबों को कुछ मिले न मिले, लेकिन उस बहस की शुरुआत जरूर हो गयी जो वो लंबे समय से चाह रहे थे। लेकिन सवाल तो ये भी है कि क्या मोदी के मिस्टर टेन परसेन्ट बन जाने के बाद वो ऐसी बहसों को शुरु करने का नैतिक अधिकार रखते हैं

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