दलित ओबीसी जातियों पर मोदित्व का दांव

अभी हाल में ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आया एक विडियो खूब चर्चित हुआ। वीडियो बनानेवाला नौजवान एक स्थानीय जाटव नेता से विकास को लेकर सवाल करता है क्या सचमुच हरिजन बस्तियों में मोदी की योजनाओं का लाभ मिला है। नेता जी रटा रटाया सा जवाब देते हैं कि बस्ती में कोई काम नहीं हुआ है। इतने में बगल में खड़ा लड़का बोल पड़ता है कि तुम झूठ बोल रहे हो। हमारी बस्ती में तो काम हुआ है। मकान भी बने हैं। तुम चाहो तो मैं अभी चलकर दिखा देता हूं। फिर वही बच्चा उन लोगों के नाम भी गिनवाता है जिन हरिजनों के मकान बने हैं। नेता जी झक मारकर चुप हो जाते हैं और वो बच्चा सोशल मीडिया का हीरो हो जाता है।

इस वीडियो का असर वोटिंग के दिन दिखा मेरठ के पास के एक गांव दुल्हैड़ा में। दुल्हैड़ा गांव में जाटव वोटरों की संख्या करीब चार सौ के आसपास है। इस बार जब जाटव वोट देने निकले तो उनमें एक समूह ऐसा भी था जिसका दावा है कि उसने मोदी को वोट किया है। यह गांव मेरठ के पास जरूर है लेकिन यह आता है मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट के तहत जहां से सपा बसपा और लोकदल के संयुक्त प्रत्याशी चौधरी अजीत सिंह हैं। तो क्या जहां हाथी निशान नहीं दिख रहा वहां हरिजन अपनी इच्छा से वोट कर रहे हैं या फिर इस बार हरिजन/जाटव वोट हाथी के मौजूद होने के बाद भी मोदी को पसंद कर रहे हैं?

इसका पूरी तरह से जमीनी आंकलन करना मुश्किल है क्योंकि भारत में आज भी किसी मतदाता का मन पढ़ना सबसे मुश्किल काम है। लेकिन अगर इस खबर में सच्चाई है जैसी दुल्हैड़ा गांव से मिली है तो मानना पड़ेगा कि बसपा के कोर वोट बैंक में भी मोदी ने सेंध लगा दिया है। इस सेंधमारी का कारण जातीय समीकरण नहीं बल्कि राष्ट्रवादी और हिन्दुत्ववादी दृष्टिकोण है। नरेन्द्र मोदी की छवि जांति पांति से ऊपर उठे एक ऐसे नेता की बन चुकी है जिसके लिए राष्ट्र सर्वप्रथम है। ऐसी छवि नौजवानों को बहुत आकर्षित करती है क्योंकि नौजवान किसी भी जाति समुदाय या वर्ग का हो आमतौर पर जातिवादी नहीं होता। जातीय प्रभाव और प्रभुत्व वयस्क या बुजुर्ग लोगों पर ही ज्यादा होता है। इसलिए गलत बोलेजाने पर एक बच्चा भी अपने ही जाति समूह के एक नेता के सामने सच बोलने के लिए तनकर खड़ा हो जाता है।

इसलिए तमाम जातिवादी राजनीतिक बहसों को थोड़ी देर के लिए किनारे कर दें तब अगर नेतृत्व की तलाश करें तो क्या वर्तमान चुनाव में मोदी की कद काठी के बराबर कोई नेता खड़ा हो पाता है? शायद नहीं। प्रदेश में स्थानीय नेतृत्व हो या फिर देश में राहुल गांधी। मोदी की छवि आम जन मानस के मन में इन सबसे बड़ी है। शायद यही कारण है कि इस बार बीजेपी ने ब्रांड मोदी पर ही सारा दांव लगाया है। चुनाव प्रचार अभियान से लेकर घोषणापत्र के कवरपेज तक सिर्फ मोदी ही मोदी हैं, पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को भी जगह नहीं दी गयी है। पार्टी के रणनीतिकार यह भांप चुके हैं कि उनके पास इस समय भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा ब्रांड है, अगर यह चल गया तो बीजेपी चल जाएगी और अगर यह नहीं चला तो बीजेपी अपनी सारी ताकत लगाकर भी कुछ खास नहीं कर पायेगी।

लेकिन सिर्फ ब्रांड मोदी को चमकाने तक ही सारा ध्यान नहीं लगाया गया है। यूपी और बिहार में पहली बार भाजपा ने सवर्णों के मुकाबले अनुसूचित जातियों और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों को ज्यादा टिकट दिया है। यह जानते हुए कि उनका परंपरागत वोटर उच्च जातीय समूह नाराज होगा उन्होंने एससी/एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने से लेकर 13 प्वाइंट रोस्टर पर भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया। इसका मतलब है कि मोदी बहुत पहले से इन जातियों को साधने में लगे हुए थे। डॉ अंबेडकर के नाम पर दिल्ली में इंटरनेशनल सेन्टर की स्थापना से लेकर उनके नाम पर दिल्ली में ही संग्रहालय बनाने का काम भी मोदी ने अपने ही कार्यकाल में रिकार्ड समय में पूरा करवाया। निश्चित रूप से ये सारे कार्य उस वर्ग के मन मानस को प्रभावित करते हैं जो अंबेडकर में अपनी आस्था रखता है। लेकिन मोदी यहीं तक नहीं रुके। दलित और ओबीसी के लिए जारी होनेवाले फंड का आवंटन और उनके लिए लागू योजनाओं का लाभ उन तक पहुंचे यह भी सुनिश्चित करवाया। मोदी की ग्राम ज्योति योजना हो या फिर आवास योजना, उज्जवला योजना हो या फिर स्वच्छ भारत मिशन। हर जगह प्राथमिकता के आधार पर दलित और पिछड़ी बस्तियों में काम को सुनिश्चित करवाया गया।

संभवत: यही कारण है कि मोदी और अमित शाह बार बार अपने सांसदों और कार्यकर्ताओं को ये संदेश दे रहे थे कि वो उन लोगों तक पहुंचे जिन तक सरकारी योजनाएं पहुंची हैं। रही सही कसर यूपी और बिहार में दलित/पिछड़े वर्ग के उम्मीदवारों को भारी संख्या में टिकट देकर पूरी कर ली गयी है। इसलिए यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी इस बार अगर मोदी की वापसी होती है तो यह माना जाएगा कि समाज के दलित/पिछड़े वर्ग पर खेला गया मोदी का हिन्दुत्ववादी दांव पूरी तरह सफल रहा। मोदी की सफलता भारत में दलित/पिछड़े वर्ग के हिन्दुत्ववादी उभार नया अध्याय होगी जो भविष्य में राजनीति की नयी नीति निर्मित करेगी। यह साबित हो जाएगा कि आमतौर पर उच्च जातियों का हिन्दुत्व रिसकर निचली जातियों में पहुंच गया है। अगर समकालीन भारत में हिन्दुत्व का चेहरा पहचानने की कोशिश करें तो जगराता से लेकर कांवड़ यात्रा तक उसके सामाजिक निशान दिखाई पड़ते हैं जहां दलित ओबीसी जातियों का वर्ग आरक्षण की राजनीति से आगे बढ़कर अपनी हिन्दुत्ववादी छवि गढ़ रहा है। लेकिन अगर ऐसा नहीं होता तो माना जाएगा कि मोदी की राजनीतिक समझ कच्ची है। पांच साल सरकार में रहने के बाद भी वो यूपी बिहार की जटिल जातीय संरचना को समझ नहीं पाये। पांच साल वो हवा में ही उड़ते रहे, और पांचवे साल हवा में ही उड़ गये।

One thought on “दलित ओबीसी जातियों पर मोदित्व का दांव

  1. वास्तव में मोदी हिन्दूत्व के ब्रांडींग को सामने रखकर ,साथ ही राष्ट्रवाद का षड्यंत्रकारी ढिंढोरा पीटकर देश के तमाम जलते-सुगते मुद्दों को दबाने में कामयाब रहे हैं ।यहभी हकीकत है कि दलित -पिछड़े जमात अपने को ज्यादा कट्टरपंथी हिन्दू बनाने के दूरगामी चालों को समझ पाने में असमर्थ हैं ।संघ की शातिराना कार्यशैली अपनी सफलता की परचम लहरा रही है ।

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