दलित आरक्षण पर ओबीसी पहरा

देश में दलित आरक्षण की पहरेदारी का जिम्मा ओबीसी नेताओं और चिंतकों ने अपने हाथ में ले लिया है। असल में उन्होंने दलितों के आरक्षण की चिंता अपने हाथ में नहीं लिया। वो एक नये राजनीतिक समीकरण पर काम कर रहे हैं जिसमें दलितों को ओबीसी नेताओं के पीछे चलाया जा सके।

न लालू यादव अनायास आरक्षण का राग गाते थे और न ही उनका बेटा तेजस्वी यादव। वो लोग अच्छे से जानते हैं कि अनुसूचित जाति और जनजाति के आरक्षण पर न कल कोई खतरा था और न आज है। अनुसूचित जातियों और जनजातियों को तो 1954 से आरक्षण मिला हुआ है, भारत में कब और कहां विरोध हुआ? तब न आरक्षण राजनीति का मुद्दा न वोट का खेल। आरक्षण राजनीति का विषय तब बना जब मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू की गयीं 1991 में। तब भारत में पहली बार आरक्षण के खिलाफ नौजवान सड़कों पर उतरे और आत्मदाह तक किया।

तब से लेकर अब तक आरक्षण का विरोध है तो उन जातियों को लेकर जो सामान्य वर्ग जैसी हैसियत ही रखते हैं। ये बात अन्य पिछड़ा वर्ग के नेता महसूस भी करते हैं इसलिए आरक्षण की पहरेदारी का काम अपने हाथ में ले लिया है। लेकिन पहरेदारी सिर्फ नौकरी तक सीमित नहीं है। इस पहरेदारी के बहाने नयी राजनीतिक गोलबंदी भी की जा रही है जिसमें यादव बिरादरी सबसे बड़ी अनुसूचित जाति हरिजन को अपने साथ लाना चाहती है। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की मायावती से गठबंध की अकुलाहट इसी का परिणाम थी।

ओबीसी आरक्षण की राजनीति करनेवाले लोगों का गणित साफ है। आरक्षित वर्ग कुल मिलाकर देश की सत्तर प्रतिशत आबादी बैठती है। इसमें ओबीसी कोटे में कहीं कहीं मुसलमान जातियां भी शामिल है। अगर इस आरक्षित वर्ग को आरक्षण के नाम पर एक कर दिया जाए तो सत्ता की चाभी हमेशा कुछ यादव नेताओं के हाथ में आ जाती है। लेकिन यह सब इतना आसान नहीं है। इस राह में रोड़े हजार हैं। और सबसे बड़ा रोड़ा है अनुसूचित जातियों और अन्य पिछड़ा वर्ग की जातियों के बीच सामाजिक भेदभाव और छूआछूत। राजनीतिक रूप से भले ही इन्हें आरक्षण के नाम पर एक करने की कोशिश की जाती हो लेकिन सामाजिक रूप से इन जातियों में अलगाव और भेदभाव दोनों है।

जैसे जैसे आप जातीय व्यवस्था में नीचे उतरते जाते हैं आप पाते हैं कि ऊंच नीच का बंटवारा आखिरी पायदान तक है। मसलन अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल जातियां अनुसूचित जाति में शामिल जातियों से सामाजिक व्यवहार, खान पान, रिश्तेदारी का कोई संबंध नहीं रखतीं। और गहराई में उतरेंगे तो पायेंगे कि अनुसूचित जाति में ही शामिल जातियां एक दूसरे से सामाजिक दूरी रखती हैं। कथित रूप से सवर्ण जातियों से इनकी दूरी को तो खूब प्रचार मिलता है लेकिन इन जातियों का आपस में जो सामाजिक बंटवारा है उसकी चर्चा नहीं होती। इसलिए ऐसे राजनीतिक एकीकरण के प्रयास भाषणों में अच्छे लगते हैं लेकिन इनकी कोई सामाजिक हैसियत नहीं बनती है। तब सवाल उठता है कि क्या पिछड़े वर्ग की 70 प्रतिशत जातियों का एकीकरण कभी संभव है?

भारत की सामाजिक संरचना को देखते हुए ऐसा लगता नहीं है। इसका सबसे बड़ा कारण वही सवर्ण जातियां हैं जिनके खिलाफ इन्हें गोलबंद करने की कोशिश हो रही है। आश्चर्य की बात ये है अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल जातियां हों या अनुसूचित जातियों में शामिल जातियां वो सब उन्हीं सवर्णों के साथ सामाजिक रूप से ज्यादा सहज हैं जिनके खिलाफ उन्हें खड़ा करने की कोशिश हो रही है। अगर हम उत्तर प्रदेश और बिहार का उदाहरण देखें तो पाते हैं कि अनुसूचित जाति में हरिजन और अन्य पिछड़ा वर्ग में यादव बाकी जातियों को अपने पीछे लामबंद करना चाहता है। लेकिन ये दोनों ही जातियां अपने अपने वर्ग में समरस जातियां नहीं है। सामाजिक रूप से ये दोनों ही जातियां अपने अपने वर्ग में भी अलग थलग ही रहती हैं।

और जहां सामाजिक जुड़ाव नहीं होता वहां राजनीतिक जुड़ाव बनाना मुश्किल होता है। बन भी गया तो उसे लंबे समय तक चलाना मुश्किल होता है। यही कारण है कि इस बार भाजपा ने यूपी और बिहार ने नया राजनीतिक समीकरण बनाया है जिसमें गैर हरिजन अनुसूचित जातियों के उम्मीदवार और गैर यादव अन्य पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों को बड़ी संख्या में टिकट दिया है। इसलिए यूपी और बिहार में ऊपर से ये जरूर दिखता है दलित और ओबीसी एक साथ आ गये हैं लेकिन अंदर से वो दूसरे दलों में बिखर गये हैं। यह भाजपा का सामाजिक समीकरण सफल होता है तो न केवल ये जातियां अपने स्वभाव के अनुसार हिन्दुत्व के साथ खड़ी हो जाएंगी बल्कि दलित ओबीसी गठजोड़ की हवा भी निकाल देंगी। अगर यह प्रयोग सफल रहता है तो यूपी और बिहार में बहुत सारे आरक्षित नेता असफल हो जाएंगे। लंबे समय के लिए।

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