जाली खबरों का मायाजाल

भारत में आम चुनाव हो रहे हैं और इन आम चुनावों में सिर्फ नेता, दल और मीडिया से जुड़े लोग ही व्यस्त नहीं हैं। एक और वर्ग है जो चुनाव में पर्दे के पीछे से अपनी हिस्सेदारी कर रहा है। वह है जाली खबरों का कारोबारी। जाली खबर या फिर बहुत प्रचलित भाषा में कहें तो फेक न्यूज का आकार प्रकार इतनी तेजी ले बढ़ रहा है कि उसको पकड़ पाना या काबू में कर पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होता जा रहा है।

भारतीय समाज में फेक न्यूज का पदार्पण हुआ है 2014 के आम चुनाव से जब प्रधानमंत्री मोदी ने पहली बार सोशल मीडिया का व्यापक तौर पर इस्तेमाल किया। प्रधानमंत्री मोदी के लिए मीडिया मैनेजमेन्ट करनेवाली अमेरिकी पीआर कंपनी एपिको ने सोशल मीडिया पर मोदी की ब्रांडिंग का जिम्मा लिया था और फेसबुक पर मोदी को पापुलर करने के लिए सैकड़ों या शायद हजारों फेक एकाउण्ट और ग्रुप क्रियेट किये गये थे। इन्हीं एकाउण्ट के माध्यम से फोटोशॉप का इस्तेमाल करके मोदी की प्रशंसा में एक से एक झूठ प्रचारित किये गये। मसलन, झाड़ू मारते हुए मोदी की फोटो प्रचारित की गयी जिसमें बताया गया कि वो जब हॉस्टल में रहते थे तो इस तरह अपने घर की सफाई करते थे। जब उस फोटो की जांच हुई तो वह फर्जी पाई गयी। उस फोटो में एक झाड़ू मारते व्यक्ति के चेहरे पर मोदी का चेहरा चिपका दिया गया था। इसी तरह गुजरात के विकास को बताने के लिए यूरोप की सड़कों, पुलों, रेलवे और मॉल आदि के फोटो इस्तेमाल करके उसे गुजरात का फोटो बता दिया गया।

इस तरह के फेक कैंपेन से मोदी को फायदा पहुंचा और उनके प्रति आम जन मानस में आकर्षण बढ़ा। वो प्रधानमंत्री बन गये और एपिको कंपनी भी परिदृश्य से गायब हो गयी। लेकिन सोशल मीडिया को नया हथियार मिल चुका था। भारत में यहीं से फेक न्यूज का कारोबार शुरु होता है जो फोटो की छेड़छाड़ से शुरु होकर अब फर्जी चिट्ठियों को लिखने से लेकर फर्जी खबरों को लिखने और प्रसारित करने तक पहुंच चुका है। और यह काम कोई एक दल कर रहा हो ऐसा भी नहीं है, हर दल की तरफ से आईटी सेल गठित किये जा रहे हैं और हर दल इस फेक न्यूज के दलदल में अपना कमल खिला रहा है। हाल में ही सोशल मीडिया पर दो चिट्ठियां अवतरित हुईं जिसमें एक मुरली मनोहर जोशी की चिट्ठी आडवाणी के नाम थी और दूसरी संघ के सरकार्यवाह भैय्याजी जोशी की चिट्ठी सरसंघचालक मोहन भागत के नाम थी। इन दोनों ही चिट्ठियों में मोदी के खिलाफ बयान था जिसका सीधा सा मतलब है कि मोदी के विरोधी भी बहुत करीने से इस फेक न्यूज इंडस्ट्री का इस्तेमाल कर रहे हैं।

फेक न्यूज के बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि यह आम जनमानस का काम नहीं होता। इसे चलानेवाले लोग हमेशा किसी दल, समूह या विचारधारा से जुड़े होते हैं। इनका एक निश्चित उद्देश्य होता है और एक लाभार्थी समूह इसे संचालित करता है। दुर्भाग्य से भारत में इस वक्त फेक न्यूज इंडस्ट्री के सबसे बड़े कारोबारी राजनीतिक दल ही बन गये हैं जो एक झूठ को झूठ साबित करने के लिए दूसरे झूठ का प्रचार कर रहे हैं। इससे बचने के लिए जरूरी है कि जनता राजनीतिक दलों के बारे में मिल रही जानकारियों को लेकर विशेष सावधान रहे। इसे प्रमाणिक समाचार स्रोतों से जांचें बिना इस पर न तो विश्वास करे और न ही कोई प्रतिक्रिया दे। जो स्थापित और पुराने समाचार समूह हैं उनके मूल स्रोत से जब तक जानकारी का मिलान न कर लें तब तक ऐसे किसी समाचार पर भरोसा न करें।

फेक न्यूज के बढ़ते व्यापार के बीच कुछ फैक्ट चेक वेबसाइटें भी बन चुकी हैं जैसे अल्ट न्यूज या फिर विश्वास न्यूज। ये वेबसाइटें इंटरनेट और सोशल मीडिया पर फैलाए जा रहे झूठ को पकड़ती हैं और सच को सामने लाती हैं। लेकिन फेक न्यूज का प्रवाह इतना तीव्र है कि हर खबर को इन वेबसाइटों के जरिए प्रमाणित करना संभव नहीं है और इन वेबसाइटों के लिए भी संभव नहीं है कि हर वायरल हो रही खबरों की जांच पड़ताल कर सकें। ऐसे में जनता का अपना विवेक ही सबसे बड़ा टूल है जो जाली खबरों के मायाजाल से उसे बचा सकता है।

जहां तक फेक न्यूज को कानून से कतरने का सवाल है तो बीते महीने मार्च में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल हुई है जिसमें सुप्रीम कोर्ट से कहा गया है कि वह सरकार को सलाह दे कि सरकार फेक न्यूज को रोकने के लिए कानून बनाये। सुप्रीम कोर्ट क्या दिशानिर्देश देता है यह भविष्य बतायेगा लेकिन इंटरनेट की दुनिया में फेक न्यूज फैलानेवालों को पकड़ना इतना आसान नहीं है। मान लीजिए एक खबर आपके पास वाट्सएप पर आती है और आपको लगता है कि यह फर्जी है और वर्तमान आईटी कानूनों के तहत ही आप शिकायत करते हैं तो पुलिस आईपी एड्रेस के जरिए उसके मूल स्रोत तक पहुंचने की कोशिश करती है। लेकिन उस मूल आईपी एड्रेस तक पहुंचना इतना आसान नहीं होता है क्योंकि कितने हजार या लाख फारवर्ड के बाद आप तक पहुंची है, वाट्स एप पर इसको पकड़ना मुश्किल है।

लेकिन वाट्स एप के मास फारवर्डिंग पर रोक लगाने से जरूर ऐसी खबरों के प्रचार और प्रसार पर शुरुआती रोक लगी है। जनता धीरे धीरे जैसे जैसे जागरुक होती जाएगी, फेक न्यूज के कारोबारी फेल होते जाएंगे। जनता का विवेक फेक न्यूज के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार हैं। क्योंकि सभ्यताओं के इतिहास में ऐसा मीडिया माध्यम पहली बार आया है जो संपादक विहीन है। ऐसे में फेक न्यूज को लेकर जनता को खुद संपादक होना पड़ेगा। याद रखिए, इंटरनेट मीडिया या सोशल मीडिया यह किसी संपादक द्वारा नियंत्रित सुन्दर उपवन नहीं है बल्कि यह सूचनाओं का एक जंगल है जहां सुन्दर वृक्ष फूल और पशु पक्षी हैं तो जहरीले पौधे और खतरनाक जानवर भी हैं। इस जंगल से बचकर निकलने की आखिरी जिम्मेदारी उस आदमी की स्वयं की है जो सूचना के इस जंगल से गुजर रहा है।

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