प्रेम बाजार में फंसा नौजवान

बीते साठ सत्तर साल से प्रेम की जितनी मार्केटिंग हुई है उतनी किसी और चीज की नहीं। हमारी फिल्में सत्तर सालों से प्रेम की संदेशवाहक बनी हुई हैं। दो नौजवान प्रेमी जोड़ों का प्रेम संसार के सब संबंधों से ऊपर होता है। उसके रास्ते में कोई बाधा आये आखिरकार उस बाधा को ही हटना पड़ता है, प्रेम की नदी आगे बह निकलती है।

प्रेम की इस कथा में बाप को हमेशा एक खलनायक की तरह ही पेश किया गया है। कहीं अमीर गरीब का मामला होता है तो कहीं जाति पांति का तो कहीं धर्म अधर्म का। बाप अपनी इज्जत, प्रतिष्ठा, सम्मान और सामाजिकता का हवाला देकर हर जगह प्रेम के राह में रोड़े अटकाता है लेकिन अंतत: हार ही जाता है। उसे हारना पड़ता है क्योंकि प्रेम को जीतना होता है।

ये फिल्में आमतौर पर शहरी पृष्ठभूमि पर ही बनती हैं जहां समाज नहीं बल्कि जीवन का आधार बाजार है। बाजार के अपने नियम कानून होते हैं जिसमें जवानी को हर हाल में जीतना होता है। जवानी बाजार का सबसे बड़ा ब्रांड है, भला बाजार उस ब्रांड को कमजोर क्यों करेगा? उसो विजेता दिखाना यह बाजार के बने रहने के लिए जरूरी भी है और मजबूरी भी। बूढ़ों के लिए बाजार ने वृद्धाश्रम बना ही रखे हैं।

लेकिन अगर कहीं समाज है तो वह सिर्फ बाजार नहीं होता। समाज सिर्फ जवानी से भी नहीं चलता। सामाजिक व्यवस्था में आश्चर्यजनक रूप से बूढ़े का महत्व जवान से ज्यादा है। इसलिए भारत बीते सत्तर सालों से समाज और बाजार के एक द्वंद में फंसा है जिसमें फिल्मी तौर पर बाजार जीतता है लेकिन यथार्थ में समाज अभी भी विजेता बना हुआ है।

हमें कल्पना और यथार्थ के इस द्वंद को समझना चाहिए। यथार्थ के जीवन का आधार कल्पनालोक नहीं हो सकता। यथार्थ की पथरीली जमीन से हमें भी होकर गुजरना ही होता है इसलिए आंख बंद करके बहुत आगे तक नहीं जा सकते। जवानी का कल्पनालोक और समाज का यथार्थ दो अलग अलग सच्चाई है। जो जवानी के कल्पनालोक को यथार्थ बनाने के चक्कर में पड़ते हैं वो बुरी गति को प्राप्त होते हैं। जिन्होंने सामाजिक यथार्थ को स्वीकार कर लिया है वो ज्यादा सुखी हैं। बाजार में रहना है तो हमें सामाजिक स्वीकार्यता का मोह छोड़ना पड़ेगा और अगर सामाजिक स्वीकार्यता चाहिए तो बाजार के नियम कानून के कल्पनालोक से बाहर आना होगा। जीवन हमारा है तो फैसला भी हमें ही करना होगा।

याद रखिए बूढ़ा पलटकर जवान नहीं होगा लेकिन जवान को आगे चलकल बूढ़ा ही होना है।

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s